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कश्मीर घाटी में जिला विकास परिषद् का चुनाव समस्या का हल नहीं मगर पहला क़दम ज़रूर है

आर्टिकल/इंटरव्यूकश्मीर घाटी में जिला विकास परिषद् का चुनाव समस्या का हल नहीं...

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उबैद उल्लाह नासिर

भारत सरकार ने कश्मीर घाटी में राजनैतिक प्रिक्रिया शुरू करने के पहले क़दम के तौर पर जिला विकास परिषद् के सदस्यों के सीधे जनता द्वारा चुने जाने के लिए जम्मू कशमीर पंचायत राज एक्ट में बदलाव किया है I यद्यपि की यह कश्मीर घाटी की सियासत के रुके हुए पानी में हलचल पैदा करने के लिए एक कंकड़ी फेंकने जैसा क़दम है लेकिन इसका स्वागत इस लिए किया जाना चाहिए कि जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटा के उसे तीन हिस्सों में बांटने के एक साल बाद एक सियासी प्रक्रिया शुरू की गयी है I यह एक साल घाटी के अवाम पर कितने सख्त और बर्बरता पूर्ण थे इसका अंदाजा वह लोग आसानी से कर सकते हैं जो कुछ महीनों के लाकडाउन में ही चिडचिडे हो गए थे I सोचिए हर तीसरे कश्मीरी पर एक जवान बंदूक लिए तयनात रहे बाहरी दुनिया से उसका नाता कट गया हो इन्टरनेट सेवा भी न उपलब्ध हो तो वहां की जिंदगी कैसी हो गयी होगी I हालांकि अभी भी वहां हालात नार्मल नहीं हुए हैं सख्तियाँ और पाबंदियां अब भी है लेकिन सियासी लीडरों की रिहाई समेत जो थोड़ी बहुत ढील दी गयी है वह भीं गनीमत है I ऐसे माहौल में जिला विकास परिषद् का सीधा चुनाव एक स्वागत योग्य फैसला है हालांकि मेन स्ट्रीम की सियासी पार्टियां इस से बहुत खुश नहीं है बीजेपी के साथ मिल कर सरकार बनाने वाली महबूबा मुफ़्ती की पार्टी PDP के सीनियर लीडर नईम अख्तर ने इस फैसले की आलोचना करते हुए कहा है की यह घाटी में सियासी सरगर्मी शुरू होने को रोकने की एक साज़िश और केंद्र शासित राज्य (UT) को जिला परिषद् या जिला असम्बली में बदल देने का खेल है, उन्होंने कहा की घाटी के अवाम की सियासी उमंगों को सड़क बिजली पानी की समस्या के हल के नाम पर दबाया जा रहा है I

लगभग यही ख्याल अन्य तमाम सियासी पार्टियों का है चूँकि घाटी की सभी महत्वपूर्ण सियासी पार्टियां वहां एक झंडे तले इकठ्ठा हो चुकी हैं इस लिए यह तो तय है की वह जिला विकास परिषद् के चुनाव में हिस्सा नहीं लेंगी इस लिए हो सकता है केंद्र इन चुनावों को पार्टी पालिटिक्स से अलग रखने की बात भी उक्त एक्ट में शामिल कर दे Iकेंद्र सुरक्षा बालों की देख रेख में संगीनों के साए में चुनाव भी करा देगा लेकिन क्या यह चुनाव जनता की उमंगों और उनकी चाहत का आइना होंगे क्या इन चुने हुए नुमाइंदों को जनता में स्वीकार्यता मिल सकेगी यह एक बहुत बड़ा सवाल होगा, हाँ अगर इन चुनावों के एलान के साथ ही घाटी में सियासी प्रक्रिया शुरू कराने का भी वादा करे और इसे इस प्रक्रिया के पहले क़दम के तौर पर पेश करे तो ज़रुर बर्फ पिघल सकेगी I भारत के शासक वर्ग को यह समझना होगा की कशमीर की समस्या विकास और आर्थिक नहीं बल्कि पूरी तरह से सियासी है और इसका सियासी हल ही निकालना होगा Iसंगीनों के साए में आप कश्मीरियों पर अपनी मर्ज़ी तो थोप सकते हैं उनका दिल नहीं जीत सकते उनका ह्रदय परिवर्तन नहीं कर सकते खास कर जिस अंदाज़ में और जिस तरह संवैधानिक रास्ते से अलग हट कर महज़ लोक सभा में बहुमत के बल धरा 370 हटाई गई है और जिस प्रकार सुप्रीम कोर्ट ने वहाँ के अवाम के संवैधानिक और बुनियादी अधिकारों की तरफ से आँख मूँद लिया है उस से घाटी के अवाम मर्माहत हैं उन्हें एक ऐसे कंधे की तलाश है जिस पर सर रख कर वह रो सकें और यह कंधा आज के हालात में केवल भारत का सुप्रीम कोर्ट ही हो सकता है जो अपने यहाँ लंबित पड़े धारा 370 हटाने का विरोध करने वाली याचिकाओं पर तुरंत संवैधानिक बेंच द्वारा निर्णय दे दे I संविधान की मामूली समझ रखने वाला व्यक्ति भी बता सकता है कि केंद्र सरकर ने धारा 370 हटाने में संवैधानिक शर्तों का उल्लंघन किया है इसे सुप्रीम कोर्ट चाहे तो 2-4 सुनवाई के बाद ही ultra vires डिक्लेअर कर सकता है इस काम में आदरणीय सुप्रीम कोर्ट द्वारा जितनी देर होगी हालात उतने ही उलझते चले जायेंगे जिसका फायदा भारत विरोधी शक्तियां ही उठाएंगी I

मोदी सरकार और उसके अंध भक्त अगर यह समझते हैं की धारा 370 हटा कर उन्हों ने कश्मीर की समस्या का समाधान खोज लिया और वह वहां संगीनों के साए में शांति स्थापित कर लेंगे तो यह उनकी बहुत बड़ी भूल है हालांकि आरएसएस शुरू से ही कश्मीर में Accomodation के बजाये Domination की पॉलिसी की हिमायती रही है जिसको आसान शब्दों में यह कहा जाता था की संघ को कश्मीर की जमीन चाहिए वहाँ के अवाम नहीं अटल जी ने इस धारणा को गलत साबित करने की कोशिश की थी उन्हों ने कश्मीरी अवाम की भावनाओं को समझा था कश्मीर समस्या के शांतिपूर्ण हल के लिए ठोस क़दम भी उठाये थे उनके बाद डॉ मनमोहन सिंह ने भी कश्मीर और पाकिस्तान के सिलसिले में उन्ही की पालिसी को जारी रखा था जिसका नतीजा था कि कशमीर में हालात नार्मल होने लगे थे आतंकवादी घटनाओं में काफी कमी आ गयी थी, विकास का पहिया घूमने लगा था, फिल्म इंडस्ट्री के लिए कश्मीर हमेशा से पसंदीदा जगह रही है मगर आतंकवाद के चलते वहां शूटिग होना बंद हो गयी थी लेकिन फिल्म इंडस्ट्री का रुझान फिर उधर होने लगा था बड़े फिल्म साजों ने लोकेशन देखना भी शुरू कर दिया था लेकिन २०१४ आते ही हालात एक दम बदल गए और आज कश्मीरी अवाम भावनात्मक तौर से भारत से जितने दूर हैं उतने कभी नहीं थे इसके लिए हमें दूसरों को दोष देने के बजाये अपने गिरेबान में भी झांकना होगा I कश्मीर में अपनी muscular policy का चुनावी फायदा बीजेपी को हिंदी पट्टी में भले मिल जाए लेकिन समस्या को नासूर बना देने की कीमत देश को अदा करनी पड़ेगी I

कश्मीर की सभी सियासी पार्टियों ने मिल कर गुपकर डिक्लेरेशन जारी किया है जिसका मक़सद वहां 5 अगस्त 2019 से पहले के हालात बहाल कराना है नेशनल कांफ्रेंस PDP कम्युनिस्ट पार्टियाँ JK peoples movement,अवामी इत्तिहाद पार्टी और peoples डेमोक्रेटिक फ्रंट सब ने एक आवाज़ में यह मुहीम शुरू करने का फैसला किया है हालांकि डॉ फारूक अब्दुल्लाह ने इस मामले में चीन को घसीट कर एक नासमझी भरा बयान दिया है लेकिन यह तय है की अगर मोदी सरकार ने इस मामले में अपनी जिद न छोड़ी और टकराव का रास्ता चुना तो वहाँ के हालात और बिगड़ सकते हैं I

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