अमित बिश्नोई
राजनीति और चुनावी राजनीति एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, फिर भी थोड़ा सा अंतर ज़रूर है. राजनीति तो हर पार्टी करती क्योंकि यह उसका काम है लेकिन चुनावी राजनीती सिर्फ और सिर्फ भारतीय जनता पार्टी ही करती है क्योंकि भारत की राजनीति में विशेषकर 2014 के बाद सिर्फ यही एक ऐसी पार्टी है जो साल के 365 दिन, दिन के 24 घंटे सिर्फ चुनावी मोड में रहती है. उसकी निगाहें बड़ी बारीकी से हर उस चीज़ को तलाशती रहती हैं जो उसे चुनावी फायदा पहुंचा सकें। इस बात से उसे कोई मतलब नहीं कि वह चीज़ उसे कहाँ से हासिल हुई, उसका राजनीतिक इस्तेमाल करना कितना नैतिक है, उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग क्या कहेंगे क्योंकि उसका मानना है कि कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना। आप लोग सोच रहे होंगे कि इतनी लम्बी भूमिका किस चीज़ के लिए, किस बात के लिए बाँधी जा रही है. आपको बता दें कि यह भूमिका एक ऐसी फोटो के लिए बाँधी गयी है जो बड़ी सिंपल सी है मगर उसका राजनीतिकरण कर दिया गया है.

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दरअसल समाजवादी पार्टी के संरक्षक मुलायम सिंह यादव और संघ प्रमुख मोहन भागवत के अनौपचारिक मुलाकात की एक फोटो कल से सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है, चूँकि यूपी में चुनावी माहौल चल रहा है तो इस तस्वीर पर सियासत होना लाज़मी भी है. दिलचस्प बात यह है कि यह तस्वीर अपने सोशल प्लेटफॉर्म पर भाजपा ने डाली और तस्वीर के कैप्शन में यह लिखकर कि “तस्वीरें बोलती हैं” हवा में एक तीर छोड़ दिया और चुपचाप बैठ गयी यह देखने के लिए कि देखें तीर कहाँ जा गिरता है.
तोड़फोड़ की राजनीति की सबसे धुरन्धर खिलाड़ी भाजपा अपने मकसद में कहीं न कहीं कामयाब भी होते दिखी। भाजपा की इस तस्वीर को कांग्रेस पार्टी ने उचक लिया और सपा और भाजपा के रिश्तों को जोड़तोड़ लोगों को बताने लगी. ज़ाहिर सी बात है कि समाजवादी पार्टी की ओर से भी इसका जवाब आना तो बनता ही है. उसने उसी कार्यक्रम की एक और फोटो जारी कर कांग्रेस को नैतिकता ज्ञान दिया। इस तस्वीर में कांग्रेस पार्टी की सहयोगी एनसीपी के प्रमुख मुलायम से मुलाकात कर आशीर्वाद ले रहे हैं.
अब बात अगर नैतिकता की करें तो समाजवादी पार्टी को इसका ज्ञान भाजपा को देना चाहिए क्योंकि उसने विवाह के अवसर पर खींची गयी एक तस्वीर पर राजनीतिक कैप्शन लगाकर विरोधी पार्टियों में आग लगाने की कोशिश की. चूँकि तस्वीर यूपी भाजपा की ओर जारी की गयी और जिस तरह जारी की गयी उसपर तो सियासत होनी ही थी. यूपी में अपनी ज़मीन को तलाश रही कांग्रेस पार्टी ने इस तस्वीर को अपने आधिकारिक ट्वीटर हैंडल पर जगह देकर उस पर सियासत का और गहरा रंग चढ़ा दिया।
अभी हाल यह कि भाजपा की रणनीति के मुताबिक सपा और कांग्रेस इस तस्वीर को लेकर एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप में बिज़ी हो गए हैं और हो सकता है दोनों पार्टियों के बीच यह तकरार कुछ और आगे बढ़े, हालाँकि मामला अभी ट्विटर तक ही सीमित है. मैंने यहाँ इस फोटो विवाद का ज़िक्र सिर्फ इसलिए किया कि भारतीय जनता पार्टी एक निजी आयोजन की फोटो का भी कितनी सफाई से राजनीतिक इस्तेमाल कर सकती है तो आप फिर अंदाज़ा ही लगा सकते हैं चुनाव में फायदा उठाने के लिए वह क्या क्या कर सकती है. इसलिए भले ही हवा सपा की ओर बहती दिख रही हो, भले लग रहा हो कि कांग्रेस भाजपा को नुक्सान पहुंचा सकती है मगर इस छोटी सी बात की अहमियत को भाजपा विरोधी पार्टियां नज़रअंदाज़ नहीं कर सकतीं.
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यह फोटो कॉन्ट्रोवर्सी सिर्फ एक बानगी भर है, भाजपा राजनीति की वह खिलाड़ी है जो अपने फायदे और चुनाव जीतने के लिए कुछ भी कर सकती है. आप इस पार्टी लाख कुछ भी कहें लेकिन चुनाव लड़ने की कला में उसका कोई मुकाबला नहीं.

