जाटलैंड किसका?

उत्तराखंडजाटलैंड किसका?

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जाटलैंड किसका?

अमित बिश्‍नोई

दिल्ली की सत्ता तक पार्टियों को पहुँचाने की पहचान वाले प्रदेश यूपी में सियासी संग्राम छिड़ चूका है शुरुआत पश्चिम से होगी जो पूरब तक जाएगी। अगर यूपी के चुनावी इतिहास को उठाकर देखें तो एक बात में बड़ी निरंतरता नज़र आती है और वह यह है कि अधिकांशतयः जाटलैंड में एक जुटता रहती है, कहने का मतलब जिसके भी साथ जाते हैं लगभग एक साथ जाते हैं, दूसरे शब्दों में आप कह सकते हैं कि सरकार बनाने और बिगाड़ने में जाटों का बहुत बड़ा महत्त्व है।

कहते हैं आगाज़ अगर अच्छा तो अंजाम भी अच्छा ही निकलता है. उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की शुरुआत चूंकि इसी जाट लैंड यानी पश्चिमी उत्तर प्रदेश से हो रही है तो हर पार्टी की निगाहें इस क्षेत्र पर लगी हुई हैं विशेषकर भारतीय जनता पार्टी और रालोद की जिसने इसबार समाजवादी पार्टी से गठबंधन किया है. 2017 के चुनाव में भाजपा ने एक तरह से क्लीन स्वीप किया था और रालोद की विरासत का एक तरह से लगभग खत्म हो गया था. इसके अलावा कांग्रेस, AIMIM लोकदल और आम आदमी पार्टी भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की क़तार में हैं।

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पिछले चुनाव की बात करें तो सभी को मालूम हैं कि किस तरह मुजफ्फरनगर के दंगे हुए, किस तरह हिन्दू और मुसलमानों के बीच ध्रुवीकरण हुआ और कैसे भाजपा को यहाँ से प्रचंड बहुमत मिला। रालोद जिसका इस क्षेत्र में व्यापक जनाधार है सबसे ज़्यादा नुकसान हुआ. और यह सब इस लिए हुआ कि जाट समुदाय ने एकमुश्त होकर भाजपा के पक्ष में वोट डाला।

अगर जाट वोटों के प्रभाव की बात करें तो लगभग 115 सीटों पर उनकी प्रभावकारी मौजूदगी है. पश्चिम यूपी में 70 विधानसभा क्षेत्र पड़ते हैं जिनमें पहले चरण में 58 सीटों पर 10 फरवरी को वोट पड़ने हैं, शेष सीटों पर 14 फरवरी को मतदान होना है. इन 70 सीटों पर लगभग 35 सीटें ऐसी हैं जिनपर जाटों का पूरी तरह से अधिपत्य है, अकेले दम पर जीत दिलाने की क्षमता रखते हैं. जाटों के बाद इस इलाके में मुसलमान भी बड़ी संख्या में हैं और कई सीटों को पूरी तरह प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं. यही वजह है कि भाजपा को छोड़कर सभी पार्टियां जाट और मुसलमान उम्मीदवारों पर दांव लगाना बेहतर समझती हैं. इस बार भी वही समीकरण हैं लेकिन पिछले पांच सालों में काफी कुछ बदल गया है. पिछले चुनाव के समय जाटों और मुसलमानों के बीच जो खाई खोदी गयी थी, किसान आंदोलन ने उस खाई को काफी हद तक पाट दिया है और यह बात जहाँ सत्ताधारी भाजपा की सबसे बड़ी चिंता का कारण है वहीँ सपा-रालोद गठबंधन के लिए काफी बड़ी राहत है।

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जाटों के साथ साथ इस क्षेत्र में खाप पंचायतों का भी बड़ा महत्व है, हालाँकि यह खाप पंचायतें एक सामाजिक संगठन की तरह होती हैं लेकिन सभी जानते हैं कि चुनाव के समय राजनीतिक पार्टियों के लिए इनका कितना महत्त्व बढ़ जाता है. अगर खाप की बात करें तो इस क्षेत्र की सबसे बड़ी खाप नरेश टिकैत वाली खाप है. चौधरी नरेश टिकट भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी हैं. राकेश टिकैत की अगुवाई में भारतीय किसान यूनियन ने किसान आंदोलन का नेतृत्व किया था और काले कृषि कानूनों के खिलाफ पीएम मोदी को झुकने पर मजबूर कर दिया था. वैसे एक साल से ज़्यादा समय तक कृषि कानूनों पर अडिग रहने वाले पीएम मोदी क्यों झुके यह सभी जानते हैं, चुनाव न होते तो शायद दिल्ली की सीमा पर किसान अभी भी ठिठुर रहे होते।

कहने का मतलब है कि किसान आंदोलन के कारण पश्चिम की 70 सीटों का महत्त्व और भी बढ़ गया है. 403 सीटों में 70 सीटें काफी अहमियत रखती हैं, इन 70 सीटों में बहुमत जिस पार्टी को मिल जाय उसके लिए सत्ता तक पहुंचना आसान हो जाता है. वोटर के मन में क्या है यह बता सकना मुश्किल है लेकिन जाट लैंड में जिस तरह भाजपा के सांसदों, विधायकों और नेताओं को दौड़ाया जा रहा है, उनका बहिष्कार किया जा रहा है उससे तो यही लग रहा है कि भाजपा के लिए जाटलैंड में इस बार हालात अच्छे नहीं दिख रहे हैं. अब देखना है कि भाजपा इस नाराज़गी को कितना दूर कर पाती है और किसान आंदोलन से मिली संजीवनी से सपा-रालोद गठबंधन कितना लाभान्वित हो सकती है।

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