सूरते हाल बिड़ग रहे हैं।ऑक्सीजन की बेहद कमी को लेकर हाहाकार मचा है। मरीजों का दम घुट रहा है, सांसे उखड़ रही हैं और उनके घरवाले ऑक्सीजन के लिए दर-दर भटक रहे हैं। अस्पतालों में भी ऑक्सीजन की कमी आने लगी है। ये तब हो रहा है जब अदालत ने सरकारों से ऑक्सीजन उपलब्ध कराने के लिए फटकार लगाई है। कहा कि सबको जीने का हक़ है, जिस बीमार को भी ऑक्सीजन की जरुरत हो तो उसे ऑक्सीजन उपलब्ध होना चाहिए है।
दवाएं और इंजेक्शन की भी कमी होती जा रही है। दवाओं/इंजेक्शन की खूब काला बाजारी हो रही है। वास्तविक मूल्य के पांच गुना अधिक दाम पर इंजेक्शन बिक रहे हैं। अस्पतालों में भर्ती होने की समस्या तो बहुत पहले से ही बनी है। एंबुलेंस नहीं,बेड नहीं, आईसीयू नहीं, आईसीयू नहीं, वैन्टीलेटर नहीं.. ये समस्याएं तो पुरानी हैं अब जब पिछले चौबीस घंटों में देश भर में कोरोना केस बहुत तेज़ी से बढ़ रहे हैं तब ऑक्सीजन की कमी को लेकर हाहाकार मच गया है।
ऑक्सीजन ना मिलने के कारण मरने की ख़बरें आ रही हैं।
लोगों में आक्रोश है। सवाल उठ रहे हैं कि सवा साल पहले जब कोरोना की शुरुआत हुई थी तब ये स्पष्ट था कि महामारी की दूसरी, तीसरी और चोथी लहर निश्चित तौर पर आनी ही है। और ये भी मालुम था कि कोरोना जब चरम पर होगा तब ऑक्सीजन की अथाह ज़रूरत पड़ेगी। इसके बावजूद पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन का इंतेजाम नहीं किया गया। जबकि सवा साल में बहुत सारे ऑक्सीजन प्लांट लगाए जा सकते थे। दुर्भाग्य ऐसा कुछ नहीं हुआ और कोरोना की दस्तक के साथ हिंदू-मुस्लिम, जमात, जमाती.. जैसी बातों में सारी ऊर्जा लगा दी गई। और तो और इस महामारी में सबसे बड़े रामबाण ऑक्सीजन जो देश में तैयार होता है वो भी खूब अधिक मात्रा में निर्यात कर दिया गया।
अब सरकार के नुमाइंदे सफाई दे रहे हैं कि औद्योगिक उपयोगों में काम आने वाला ऑक्सीजन ही निर्यात हुआ है। अब सवाल ये पैदा होता है कि औद्योगिक उपयोग वाले ऑक्सीजन का उपयोग यदि मरीजों के लिए नहीं किया जा सकता तो सरकार ने औद्योगिक इकाइयों में ऑक्सीजन के उपयोग को रोक कर उनके ऑक्सीजन को मरीजों के उपयोग में इस्तेमाल करने की बात क्यों कही है !
नवेद शिकोह

