अमित बिश्नोई
महाराष्ट्र में कल शाम शिवसेना के बाग़ी नेता एकनाथ शिंदे ने नए CM के रूप में शपथ ली, यहाँ तक तो सब ठीक रहा मगर जब दो बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे और तीसरी बार इस कुर्सी पर फिर काबिज़ होने का पिछले ढाई साल से भागीरथी प्रयास करने वाले देवेंद्र फडणवीस उपमुख्यमंत्री के रूप शपथ लेने के लिए खड़े हुए तो भाजपा के लोग भी हैरान थे। सिर्फ चंद मिनटों में सारा खेल कैसे और क्यों पलटा इसपर सारे राजनीतिक पंडित हैरान हो गए, सभी जानते थे कि पिछले नौ दिनों से महाराष्ट्र के बाहर से चल रही महाभारत का क्लाइमेक्स ऐसा तो हरगिज़ नहीं लिखा गया होगा। फडणवीस का मुख्यमंत्री न बनना तो सपने का टूटना कहा जा सकता है लेकिन दो बार के मुख्यमंत्री का ढाई साल के अथक प्रयासों के बाद उपमुख्यमंत्री के रूप में प्रतिफल मिलेगा, ऐसा तो उसने सपने में भी नहीं सोचा होगा।
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फडणवीस के साथ कल जो कुछ हुआ उसे आप क्या नाम दे सकते हैं. मुझे तो लगता है कि ऐसा सिर्फ भाजपा में हो सकता है. अब सवाल यह उठता है कि भाजपा ने महाराष्ट्र के सबसे कद्दावर नेता के साथ ऐसा किया क्यों? अगर शिंदे सरकार में शामिल होना भाजपा की राजनीतिक मजबूरी थी तो फिर फडणवीस की जगह पर किसी और को डिप्टी सीएम बनाया जा सकता था. खासकर उस समय जब फडणवीस ने शपथ ग्रहण से ठीक पहले ये एलान किया था कि मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे बनेगे और वो सरकार से बाहर रहेंगे। तो क्या भाजपा आला कमान ने फडणवीस के इस एलान को पार्टी के नियमों की अवहेलना माना, क्या फडणवीस ने यह एलान करने से पहले दिल्ली को जानकारी नहीं दी थी?, क्या उनसे इसकी अनुमति नहीं ली थी? आम तौर पर इस तरह के सार्वजानिक एलान करने की हिम्मत मोदी और शाह की भाजपा में अबतक तो किसी ने नहीं की, तो क्या फडणवीस महाराष्ट्र में खुद को ही भाजपा मान बैठे थे? वैसे इस पूरे कथानक पर अगर गौर करें कि तो साफ़ लगता है कि फडणवीस ने पार्टी से आगे जाने के कई बार प्रयास किये हैं और दिल्ली में आला कमान को वो प्रयास अच्छे नहीं लगे थे.
बहरहाल राज्यपाल को सरकार बनाने का प्रस्ताव पेश करने और उसके बाद मिठाई खाने और खिलाने की जो तस्वीरें मीडिया में गश्त कर रही थीं, वो तो कुछ और ही कहानी कह रही थीं लेकिन प्रस्ताव से प्रेस कांफ्रेंस तक कहानी बदल गयी. फडणवीस की जगह शिंदे का नाम पुकार दिया गया, मगर शायद भाजपा आला कमान फडणवीस को कुछ और बड़ा सबक सिखाना चाहता था और इसलिए दिल्ली से एक ट्वीट आया जिसमें फडणवीस से सरकार में रहने और उपमुख्यमंत्री की शपथ लेने का अनुरोध किया गया, कुछ ही मिनटों में दिल्ली से ही एक और ट्वीट आया कि फडणवीस ने पार्टी का अनुरोध स्वीकार कर लिया है. मतलब फडणवीस के लिए चंद मिनटों में सारे रास्ते ब्लॉक कर दिए गए, सिवाय बगावत के और उसकी हिम्मत आज की भाजपा में किसी के पास नहीं है. मजबूर और बेबस होकर फडणवीस को अपमान का यह कडुआ घूँट पीना पड़ा.
आप कल्पना कर सकते हैं कि अगर यह किसी और पार्टी के फडणवीस के साथ ऐसा हुआ होता तो यही फडणवीस क्या कर सकते थे. अब आप इसे भाजपा का अनुशासन मानिये या फिर दिल्ली का डर, आप बिना दिल्ली की मर्ज़ी के कुछ करने की तो छोड़िये कह भी नहीं सकते। और अगर ऐसा करेंगे तो अंजाम भी ऐसा ही भुगतेंगे। भाजपा और मोदी-शाह समर्थकों का यह कहना अपनी जगह सही हो सकता है कि पार्टी में सभी को अनुशासन में रहना होता है और फडणवीस ने भी एक अनुशासित सिपाही की तरह दिल्ली का कहना माना है लेकिन फडणवीस के दिल से पूछिए कि इस वक्त उनके मन में क्या चल रहा और उनके ऊपर क्या गुज़र रही है. हो सकता है भाजपा की यह कोई चाणक्य रणनीति हो मगर दो बार का मुख्यमंत्री तीसरी बार उपमुख्यमंत्री बनने को तैयार हो जाय ऐसी पदावनति सिर्फ आज की भाजपा का नेता ही स्वीकार कर सकता है . फडणवीस को भविष्य में भाजपा अब चाहे जितना बड़ा इनाम दे मगर इस अपमान की भरपाई कोई इनाम या सम्मान नहीं कर सकता। अंत में यही कहूंगा कि फडणवीस के भागीरथी प्रयासों का आला कमान ने अच्छा सिला दिया जिसे फडणवीस मरते दम तक न भूल पाएंगे।

