उत्तराखंड में डैमेज कंट्रोल करना भाजपा के लिये चुनौती

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उत्तराखंड में डैमेज कंट्रोल करना भाजपा के लिये चुनौती

सीएम रावत के इस्तीफे के बाद खड़े होंगे अनेक यक्ष प्रश्न
सीएम चुनने के लिये भी अंदरूनी राजनीति का करना होगा मुकाबला

सुनील शर्मा

न्यूज डेस्क। उत्तराखंड के सीएम त्रिवेंद सिंह रावत के आज मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिये जाने के बाद भी भाजपा के लिये चुनौती कम होने वाली नहीं हैं। रावत के इस्तीफे के बाद राज्य और पार्टी के भीतर हुए डैैमेज को कंट्रोल कर पाना भाजपा के लिये आसान नहीं होगा। वहीं सीएम के खाली हुए पद पर बैठने की इच्छा मन में लिये अनेक प्रत्याशी भी सामने आयेंगे जिनके बीच से सर्वमान्य नेता को सीएम की कुर्सी पर बैठाना भी खासी मशक्कत का काम होगा।

उत्तराखंड भाजपा में सीएम त्रिवेंद सिंह रावत के खिलाफ विरोध के स्वर काफी पहले से उठ रहे थे। मगर इन आवाजों को भाजपा नेतृत्व ने अनुशासन की बेड़ियों में बांध रखा था। एक टीवी चैनल के सर्वे में उत्तराखंड के सीएम रावत को देश का सबसे अलोकप्रिय मुख्यमंत्री माना गया था। विधानसभा चुनाव के आगमन की आहट होते ही भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को उत्तराखंड की याद आयी और पर्यवेक्षकों का एक दल ने राज्य में आकर जमीनी हकीकत का आंकलन किया। भाजपा विधायकों ने उन्हेें सीएम रावत के मुख्यमंत्री बने रहने पर आने वाले चुनाव के भाजपा को नुकसान उठाने का अंदेशा जताया तो शीर्ष नेतृत्व ने रावत से इस्तीफा दिलाने में जरा भी देर न की।

लेकिन सीएम रावत के इस्तीफे के बाद भी उत्तराखंड में भाजपा की मुश्किलें समाप्त होने की बजाये बढ़ती दिख रही हैैं। सीएम त्रिवेंद सिंह रावत के कार्यकाल में लिये गये अनेक फैसले ऐसे रहे जिन्होंने जनता को नाराज कर दिया। गढ़वाल के हिस्से गैरसैंण मंडल में कुमांऊ के 2 जिलों को शामिल करने के निर्णय ने कुमाऊं मंडल में सियासी भूचाल ला दिया। वहीं उत्तराखंड देवस्थानम् बोर्ड बनाकर केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री धाम को सरकार के अधीन करने के फैसले ने उत्तराखंड के संत समाज को नाराज कर दिया। रावत की ही पार्टी के सांसद सुब्रमण्यम स्वामी ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दे दी थी। इस मामले की सुनवाई अभी सुप्रीम कोर्ट में चल रही है। गैरसैंण को राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित किया गया मगर अफसरों के देहरादून में ही रहने की वजह से इसका कोई लाभ आज जनता को नहीं मिला। सीएम रावत के इन फैसलों से भाजपा आलाकमान भी खुश नहीं था। वहीं भाजपा के विधायक भी सरकार के इन फैसलों का विरोध पर्यवेक्षकों के समक्ष कर चुके थे। ऐसे में उत्तराखंड विधानसभा चुनाव में हार जाने के डर का सामना कर रही भाजपा के पास सीएम से इस्तीफा दिलाने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था।

मगर भाजपा के सामने कई बड़ी चुनौतियां अब सामने आकर खड़ी होंगी। सबसे पहली चुनौती होेेगी सीएम पद के दावेदारों के बीच से कोई ऐसा नेता चुनना जो सीएम पद के लिये सर्वमान्य हो। क्योंकि उत्तराखंड के अनेक दिग्गज भाजपा नेता सीएम पद की कतार में खड़े हैं। ऐसे में किसी एक को पद पर बैठाकर बाकियों को संतुष्ट कर पाना भी आसान नहीं होगा। सीएम चुने जाने के बाद त्रिवेंद सरकार के फैसलों से हुए डैमेज को कंट्रोल कैसे किया जाये यह यक्ष प्रश्न भी भाजपा के सामने होगा। यदि त्रिवेंद सरकार के फैसलों को पलटा जायेगा तो भाजपा और रावत की नीतियों पर सवाल उठेंगे जिसका लाभ चुनावी वर्ष में विपक्षी दल उठाने से नहीं चूकेंगे। और यदि सीएम रावत के फैसलों को बरकरार रखा गया तो जनता में व्याप्त आक्रोश को शांत करना मुश्किल होगा। वहीं सीएम रावत के इस्तीफे को लेकर भी विपक्षी दल भाजपा पर अनेक सवाल उठायेंगे जिससे जनता में गलत संदेश जा सकता है। इसलिये पार्टी की प्राथमिकता यह होगी कि रावत को दिल्ली में कोई पद दे दिया जाये ताकि उनका और खासकर पार्टी का सम्मान बचाया जा सके।

कुल मिलाकर भाजपा के लिये एक तरफ कुआं तो दूसरी तरफ खाई है। अब देखना होगा कि चुनावी वर्ष की बेला में पार्टी नेतृत्व किस तरह से उत्तराखंड में नुकसान होने से बचायेगा। रावत को पद से हटाने का फैसला सही है या गलत यह तो अगले वर्ष होने वाले चुनाव के परिणाम ही बतायेंगे। लेकिन यह तय है कि अब तक रावत सरकार के फैसलों को नजरअंदाज करने का परिणाम भाजपा को भुगतना होगा। वर्तमान हालात में तो आने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा की राह आसान नहीं दिख रही।

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