अमित बिश्नोई
उत्तर प्रदेश के भदोही ज़िले के सुरियावां में 2001 में जन्म लेने वाले एक लड़के ने 10 वर्ष की उम्र में अपने सपने को साकार करने के लिए साधना के लिए मुंबई शहर को चुना। ये लड़का और कोई नहीं, आज की और भविष्य की क्रिकेट का सितारा यशस्वी भूपेन्द्र जयसवाल है जिसने कल क्रिकेट के जनक इंग्लैंड को उन्ही के अंदाज़ में क्रिकेट खेलकर टेस्ट क्रिकेट इतिहास की एक बड़ी शर्मनाक हार से दो चार किया। बैजबाल क्रिकेट का ढिंढोरा पीटने वाले मैक्कुलम की टीम को दिखा दिया कि बैजबाल क्रिकेट तो हम खेलते हैं। आक्रामक क्रिकेट क्या होती, इसे कहते हैं. क्या शानदार दोहरा शतक था इस लड़के का. कीर्तिमानों से भरा हुआ, चौकों और छक्कों से सराबोर। मात्र सात टेस्ट मैच, जिसमें दो दोहरे शतक और एक शतक 171 रनों का. इसी के साथ दो पचासे भी. एवरेज 71 का, स्ट्राइक रेट 70 का, रन 861 और पारियां सिर्फ 13. इसे कहते हैं एक स्वर्णिम शुरुआत।
171 रनों की पारी खेलकर अपने टेस्ट करियर की शुरुआत करने वाले यशस्वी जायसवाल की राजकोट में खेली 214 रनों की नाबाद पारी ने आक्रामक क्रिकेट की एक नयी मिसाल, एक नयी छाप पेश की है. इस पारी में छक्कों की बारिश और चौकों का बहाव देखने को मिला। टेस्ट क्रिकेट जहाँ दो चार छक्के मारना मुश्किल होता है, एक ही पारी में 12 छक्के जड़ देना कोई आसान काम नहीं, आसान होता 28 साल से ये रिकॉर्ड वसीम अकरम के नाम न होता। ये तो रोहित शर्मा ने पारी को घोषित कर दिया वरना यशस्वी जिस मूड में थे उसे देखते तो यही लग रहा था कि कुछ समय अगर और मिल गया होता तो सबसे ज़्यादा छक्कों का ऐसा रिकॉर्ड बन गया होता जो शायद फिर कभी नहीं टूटता। खैर विश्व रिकॉर्ड बराबर करना भी कोई मामूली बात नहीं। सिर्फ यही नहीं, यशस्वी ने इस श्रंखला में अबतक 20 छक्के लगा दिए हैं और ऐसा करने वाले वो टेस्ट इतिहास के पहले बल्लेबाज़ हैं और अभी तो दो टेस्ट मैच पड़े हैं. यशस्वी के फॉर्म को देखते हुए सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है कि आगे दो टेस्ट मैचों में और कितने छक्के लगेंगे। तीन मैचों की 6 पारियों में जब 20 छक्के लग चुके हैं तो फिर अगली चार पारियों में छक्कों की संख्या 30 तो पहुंचनी ही चाहिए।
लोगों को ,एक दोहरा शतक लगाने में परेशानी होती है, बन्दे ने अबतक दो दोहरे शतक लगा दिए हैं, ऐसा करने वाला क्रिकेट का ये नया तपस्वी विनोद कांबली और विराट कोहली के बराबर आ गया है और उसके पास मौका है इन दोनों से आगे निकलने का. अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट की अलप आयु में डबल सेंचुरी जड़ने के मामले में भी वो महान गावस्कर और विनोद कांबली के बाद तीसरे नंबर है. सिर्फ 22 वर्ष की उम्र में एक टेस्ट श्रंखला में 500 रन बनाने वाले वो दूसरे भारतीय बल्लेबाज़ हैं, इससे पहले ये कारनामा सुनील गावस्कर कर चुके हैं। कहने का मतलब इतने छोटे से टेस्ट करियर में इतने ढेर सारे कीर्तिमान? आगे ये लड़का क्या करेगा? क्या हम मान लें कि भारतीय क्रिकेट को एक बांये हाथ का विराट मिल चूका है? एक लोकोक्ति है ‘पूत के पाँव पालने में पहचाने जाते हैं’, यशस्वी के वर्तमान लक्षणों ने बता दिया है कि भविष्य क्या होने वाला है.
एक लड़का जो सिर्फ 10 साल का हो और वो बिना किसी सहारे, बिना किसी मदद के मुंबई जैसे शहर पहुंचे, अपने सपनों को पूरा करने, ये उसकी लगन और उसके कमिटमेंट को दर्शाता है. मुंबई तो वैसे भी सपनों की नगरी कही जाती है, लोगों के सपने यहाँ पूरे होते हैं लेकिन उससे पहले ये शहर इम्तेहान भी खूब लेता है। यशस्वी का भी लिया। यशस्वी ने यहाँ कई साल बिना सहारे, बिना ठिकाने के गुज़ारे, पेट भरने के लिए पानी पूरी भी बेचीं, तम्बू में सैकड़ों रातें काटीं लेकिन उसकी तपस्या में कोई कमी नहीं आयी और एक दिन एक पारखी नज़र उसपर पड़ी और यशस्वी को इंसानों के जंगल में एक सहारा मिल गया. इस शख्स ने यशस्वी में छुपी प्रतिभा का पहचाना और अपनी क्रिकेट अकादमी में न सिर्फ उसको जगह दी बल्कि शहर में उसका कानूनी गार्जियन भी बना. इस शख्स का नाम है ज्वाला सिंह है जो यशस्वी के जीवन में गॉड फादर बनकर आया और वो लड़का अब सबके सामने अपने नाम के मुताबिक यश फैला रहा है और अपनी चमक बिखेर रहा है। उसे उसकी तपस्या का फल मिला है. भारतीय क्रिकेट के इस नए तपस्वी को सलाम और उसके उज्जवल भविष्य की कामना।

