सुनील शर्मा
लोजी लो करलो बात, ये बात तो बिल्कुल भी समझ नहीं आ रही। रोज कोरोना मरीजों के रिकार्ड टूट रहे हैं, लाॅकडाउन का खतरा सिर पर मंडरा रहा है। गंगा मैया के दर्शन करने से पहले कोविड नेगेटिव रिपोर्ट दिखानी पड़ती है, स्कूल बंद करा दिये, बाजार बंद कराने की तैयारी चल रही है। देश कोरोना संकट से जुझ रहा है। फिर भी जहां चुनाव हो रहे हैं वहां कोरोना क्यों नहीं जा रहा। हम घरों में बैठे हैं तो भी कोरोना का खतरा है। लाखों लोग जो चुनावी रैलियों में जाते हैं वो क्या कोरोना प्रूफ बन गये हैं। आखिर कौन सी वैक्सीन लगवाई है चुनावी रैलियों में जाने वालों ने जो उनकी जान को कोई खतरा नहीं है।
सुबह-सवेरे अखबार पढ़ने के बाद शर्माजी का पारा हाई और जुबान बेलगाम हो रही थी। समझ नहीं आ रहा था कि सरकार को कोसे या कोरोना को। अब सरकार को कोसने पर होने वाला खतरा कोरोना से भी बड़ा था। कोरोना तो सिर्फ होम आइसोलेट करवाता मगर सरकार जेल आइसोलेट कराये बिना न मानती। तो भईया जी सरकार से दूर रहो और कोरोना को ही कोस कर काम चला लो।
लेकिन शर्माजी का गुस्सा सातवें आसमान पर था तो किसी पर तो उतरना ही था सो शर्माजी पहुंच गये कोरोना के पास। लेकिन कोरोना को देखा तो शर्माजी चौंक गये। वो तो समझते थे कि कोरोना बहुत ताकतवर है। मगर कोरोना के गले में रस्सी डालकर उसे खूंटे से बांध रखा था। सूरत देखकर ही लग रहा था कि कई दिनों से उसे भूखा-प्यासा रखा हुआ है। उसकी हालत देखकर शर्माजी को दया आयी और उन्होंने कोरोना को सहारा दिया। एक घूंट पानी पिलाया तो कोरोना की जान में जान आयी।
अब शर्माजी ने तुरंत कोरोना से सामाजिक दूरी बनाना ही उचित समझा। छह फीट दूर बैठकर शर्माजी ने सवाल दागा, क्यों भाई कोरोना इतनी मनमानी क्यों मचा रखी है कोई दीन-ईमान है कि नहीं। अरे स्कूल-काॅलेज, आफिस में जाते हो, शादी-ब्याह में मिल जाते हो और तो और गंगाजी जाओ तो तुमसे टकराने का खतरा बना रहता है। भईया एक साल हो गया कुछ काम नहीं हो रहा सही से। और तुम हो कि आम आदमी के सारे आयोजनों में पहुंच जाते हो लेकिन खास की चुनावी रैलियों से दूर रहते हो। चुनाव का ऐलान होते ही तुम दुम दबाकर भाग जाते हो। तो कोरोना भाई वो चुनाव वाले इलाको में क्या टोटका करते हैं हमें भी बताओ जरा। क्या उन राज्यों में लोगों को खास किस्म की वैक्सीन दी जाती है या जगह-जगह पर कोरोना प्रूफ स्प्रे का छिड़काव किया जाता है। भईया, सालभर से ज्यादा हो गया तुम्हें देश में आये, अब तो हम तुम्हें विदा करना चाहते हैं। बस तरीका क्या है यह तुम ही बता दो।
शर्माजी की बातें सुनकर कोरोना की आखों से आंसू आ गये। रूंधे गले से कोरोना बोला, भाई मैं भी कौन सा यहां बसने आया था। मेहमानों की तरह आया था, भारत भ्रमण करके जाना चाहता था। अरे सीना चौड़ा करके आया था यहां मगर 56 इंच के सीने वालों ने मुझे यहीं बांध कर अपना हथियार बना लिया। अब तो मैं सत्ता के सौदागरों का पालतू बन गया हूं, जब कहते हैं जहां कहते हैं और जिसको कहते हैं काट लेता हूं। कब से गुहार लगा रहा हूं कि मुझे जाने दो, मैं अब यहां नहीं रहना चाहता। अब न मेरे बदन में जान रहीं और न ही भारत घुमने की इच्छा। मगर मेरी आवाज सत्ता की ख्वाहिशों में दबकर रह जाती है। कभी कहते हैं वहां जाकर लोगों को काट तो अगले ही दिन कहते हैं अब दुम दबाकर बैठ जा। बताओ भईया, सारी दुनिया को डरा दिया मगर यहां आने की गलती करने की सजा भुगतनी पड़ रही है।
कोरोना के खुलासे से शर्माजी भौंचक्के थे। पहले सिसकते कोरोना और फिर खुद को संभाल कर शर्माजी ने पूछा, भाई कोरोना मैं तुम्हारा दुखः समझता हूं। लेकिन सत्ता के सौदागर भले ही न समझे लेकिन तुम तो आम जनता का दर्द समझो। कोई तो तरीका होगा जिससे तुम देश से विदा हो जाओ। तुम्हारी भी इज्जत रह जाये और हमारा भी काम बन जाये।
शर्माजी के सवाल पर कोरोना ने कहा, हे शर्माजी, आज आप सत्ता के सौदागरों के झूठे वादों के भ्रमजाल को तोेड़कर मेरे पास आये हैं तो आपको सच बताना और मार्गदर्शन करना मेरा धर्म है। भले ही मैं जानलेवा हूं लेकिन नेताओं की तरह जनता की पीठ पीछे वार नहीं करता। मैं आतंक फैलाता हूं और चला जाता हूं, लेकिन ये नेता तो एक बार कुर्सी पर बैठकर छोड़ने को ही तैयार नहीं होते। लाख झूठ बोलेंगे, गुमराह करेंगे मगर कुर्सी पर कब्जा जमाये रखेंगे। तो हे शर्माजी, इन नेताओं की कथनी और करनी को भूलकर अपने चित्त को ध्यान लगाओ और मेरी बातों का मर्म समझो। हिन्दुस्तान के जिस भी राज्य में जब भी चुनाव कराया जायेगा, वहां कोरोना का मरीज नहीं पाया जायेगा। क्योंकि चुनाव में कोरोना मरीज मिला तो नेताओं को कुर्सी नहीं मिलेगी। शर्माजी, गूढ़ज्ञान का मर्म समझना, मैं यह नहीं कह रहा कि चुनावी राज्यों में कोरोना मरीज नहीं होगा। मैं यह कह रहा हूं कि वहां कोरोना का मरीज नहीं मिलेगा। तो भईया जब तक चुनाव हैं तब तक तोे मुझे भी रोना है। हां एक बार मतदान हो जाये फिर देखना मेरा जलवा, एक-एक को चुनकर शिकार बनाऊंगा। मैं कोई नेता नहीं कि वोट डला और वोटर को भूल गये।
फिर भी आप मेरी शरण में आये हैं तो मैं गूढ़ज्ञान के रहस्य से आपको परिचित जरूर कराऊंगा। जिस भी राज्य में कोरोना के मरीज बढ़ते दिखें वहां चुनाव का ऐलान कर दो। देखना चुनाव की घोषणा होते ही लोगों की इम्युनिटी बढ़ जायेगी और मुझे उनसे दूर ही रहना होगा। और पास आ भी जाऊंगा तो कर क्या लूंगा। आंकड़ों का खेल तो सरकारें खेलती हैं, जान जायेगी जनता की तो उसकी परवाह किसे है। देश चले न चले राजनीति चलना जरूरी है। राजनीति है तो कुर्सी है, कुर्सी है तो पावर है, पावर है तो कोरोना इम्युनिटी बूस्टर है। अब ये सुविधा वहीं मिलेगी जहां चुनाव है। अब आगे खुद ही समझ जाओ, सब कुछ मैं ही समझाऊं क्या।
कोरोना की बात सुनकर शर्माजी की सब शंकाओं का समाधान हो गया। उन्होंने कोरोना को प्रणाम किया और अपने घर को चल दिये। कोरोना से मिले गूढ़ज्ञान ने उनके ज्ञानचक्षु खोल दिये थे। वह समझ गये थे कि कोरोना अब बस राजनीति है। सरकार की मर्जी पर पल रहा कोरोना उनके हुकुम का गुलाम है। आम जनता का क्या है कभी उसे कोरोना मारेगा तो कभी सरकार, पहले कौन मारेगा यह सबकी अपनी-अपनी किस्मत है।

