कार्यालयों में अब सिर्फ 50 फ़ीसदी कर्मचारियों को काम करने की इजाज़त
- नवेद शिकोह
इस बार वाला कोरोना उत्तर प्रदेश में कुछ ज्यादा ग़ज़ब ढा रहा है। हर दिन संक्रमण की तेज़ होती रफ्तार से अस्पताल उबल रहे हैं। ख़ौफ से सड़कों में सन्नाटा और शमशानों और क़ब्रिस्तानों में चहल-पहल बढ़ रही है। बाजारों में आदमी कम दिख रहे हैं और शमशानों -क़ब्रिस्तानों में लाशें ज्यादा नज़र आ रही हैं। जीवन बचाने की जद्दोजहद में इलाज और जांच के लिए आम इंसान का संघर्ष तेज हो गया है। मिडिल क्लास और गरीब लोगों को मौत और जिन्दगी की कशमकश में पेट, रोटी और भूख की फिक्र भी सताने लगी है। क्योंकि निजी क्षेत्र में काम करने वालों कै रोज़गार और तनख्वाह का बरक़रार रहना मुश्किल हो सकता है।
सूबे की जनता के हर परिवार में सरकारी मुलाजिम नहीं है। अनुमान है कि सौ परिवारों में सिर्फ बीस प्रतिशत परिवारों में ही सरकारी नौकरी वाला सदस्य होगा। बाक़ी अस्सी फीसद आम जनता के परिवार का भरणपोषण करने वाले लोग गैर सरकारी नौकरी पर निर्भर हैं। लॉकडाउन से राजस्व में भारी कमी आती है।सरकारी खजाना हलका होने लगता है। इसलिए यूपी सरकार विस्फोटक होते हालात में भी फिलहाल लॉकडाउन लगाने का इरादा नहीं कर रही है। एक कारण ये भी है कि लॉकडाउन से रोज खाने और रोज कमाने वाले गरीब मज़दूरी और ठेले वाले की रोजी रोटी भी खत्म हो जाती है।
नाइट कर्फ्यू दिन की चहल पहल नहीं कर सकता इसलिए अब सरकारी और प्राइवेट सेक्टर के लिए उत्तर प्रदेश सरकार का आदेश आया है कि पचास फीसद कर्मचारियों से कार्य लिया जाए। यानी आधे लोगों से ही कार्यालय और फील्ड के कामों लिया जाए। बाक़ी पचास फीसद कार्मिकों को घर में बैठ के ही काम करने निर्देश दें। प्राइवेट सेक्टर में तमाम ऐसे मुलाज़िम हैं जिनका काम घर पर बैठ कर या ऑनलाइन नहीं हो सकता। ऐसे कर्मचारियों को प्राइवेट सेक्टर के मालिक घर बैठने पर तनख्वाह नहीं देंगे तो उनका घर कैसे चलेगा। उत्तर प्रदेश सरकार के अपर मुख्य सचिव के आदेश में यदि ये भी आदेश या आग्रह होता कि प्राइवेट सेक्टर में किसी कर्मचारी का वेतन ना रोका जाए, तो बेहतर था।

