न मास्क की जरूरत न सामाजिक दूरी बनाना है जरूरी
सुनील शर्मा
लो जी लो कर लो बात, लोग भले ही कितना कहें मगर साहेब परेशान बहुत है जनता के लिए। अब देखो ना कोरोना आने के साथ दाढ़ी बढ़ाई जो आज तक नहीं कटवाई, और लोग हैं कि उन्हें चैन से जीने भी नहीं देते। अब देखो साहेब ने कोरोना को लेकर नेताओं से बात की, कोरोना पर कितनी चिंता जाहिर भी की। और तो और साहेब का जलवा तो देखिए कि अब से पहले जो बैठक बंद कमरों में गोपनीय हुआ करती थी उसे सीधा टीवी पर लाइव करा दिया। इसे कहते हैं आम के आम और गुठलियों के भी दाम। लाइव करा कर टीवी पर संदेश देने में लगने वाला समय भी बचा लिया और अपनी बात भी कह दी। अब भईया चुनाव का टाइम चल रहा है समय की शार्टेज तो है ही न, इसलिये कर दिये एक ही तीर से दो शिकार।
अब लोग भी है ना कुछ भी कहते रहते हैं। बताओ भईया, लोग सवाल उठा रहे हैं कि अगर कोरोना इतना ही फैल रहा है तो बंगाल चुनाव में रैलियां क्यों करवा रहे हैं, वहां भी तो फैल सकता है कोरोना। अरे भाई, नादान लोग इतना भी नहीं समझते की राजनीति की गर्मी देख कर कोरोना क्या अच्छे-अच्छे को रोना आ जाये। अरे जहां मंच से साहेब गरज रहे हों वहां कौन से कोरोना की हिम्मत है जो आकर उनसे टकरा जाए। देखो ना उन्होंने तो कोरोना के पीक टाइम में भी बिहार में चुनाव करा दिए थे। सोशल डिस्टेंसिंग का नारा लगाते-लगाते लोगों को लाइन में लगवा दिया। लेकिन साहब, कहीं दिखा आपको कोरोना, नहीं ना, तो फिर क्यों उठाते हो साहब की चिंता और मंशा पर सवाल। अरे साहेब तो साहेब हैं , उनकी सरकार चाहे तो चंद लोगों के धरना-प्रदर्शन पर भी कोरोना महामारी एक्ट में मुकदमा लगवा दें। और ना चाहे तो लाखों की भीड़ इकट्ठा कर लें। अरे कोरोना तो साहिब के हाथ की गेंद है जहां चाहें वहां फेंक दें, दूसरे को चोट पहुंचा कर वापस तो उनके पाले में ही आनी है।
अब लोगों को भी सवाल करने की बुरी आदत पड़ गई है। पूछते हैं भाई कोरोना है भी कि नहीं। कहते हैं, साहेब की रैलियों को देखें तो लगता है कोरोना कभी था ही नहीं। और जबरन लगाई गई बंदिशों, कोरोना के बढ़ते सरकारी आंकड़ों को देखें तो लगता है कि कोरोना जान लेकर ही मानेगा। अब इन लोगों को कौन समझाए की भैया कोरोना का होना भी जरूरी है और उस से डरना भी जरूरी है। देश का चलना भी जरूरी है और राजनीति चलते रहना भी जरूरी है। दवाई बनवाना भी जरूरी है और उनको लगवाना भी जरूरी है। और इन सब के लिए चिंता जाहिर करना भी जरूरी है। और लोगों के लिए भी जरूरी है कि वह सरकार की जरूरत को समझें और उनकी जरूरत को पूरा करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाए। वरना बेफिजूल के सवाल ना उठाए चुपचाप शाम को अपने घर चले जाएं। यूं चौपालों पर मजमा लगा कर सरकार पर सवाल उठाओगे तो कोरोना से रोना तो पड़ेगा ही। चुपचाप घर बैठे रहोगे तो न कोरोना सताएगा और न ही सरकार।
तो भईया जी फैसला तुम्हारे हाथ में है, कोरोना को लंबा खींचना है तो उठाते रहो बेफिजूल के सवाल। जितना सवाल उठाओगे कोरोना का ग्राफ उतना ही बढ़ता जाएगा। शांति से बैठोगे तो कोरोना छू भी नहीं पायेगा। और चिंता कतई ना करो। कोरोना चाहे पूरे देश में फैल जाए मगर जिस प्रदेश में चुनाव हो रहे होंगे वहां तो कोरोना के आने का सवाल ही पैदा नहीं होता। क्योंकि वहां तो साहेब खुद रक्षा कवच लेकर पहुंचते हैं जो उनके प्रिय वोटरों को कोरोना के खतरे से बचाकर रखता है। पूरी तरह कोरोना वायरस फ्री रैलियां होती हैं साहेब की, न मास्क की जरूरत और न सामाजिक दूरी की। बस साहेब जिंदाबाद के नारे बराबर लगाते रहो, कोरोना खुद दूरी बनाये रखेगा।
और तुम्हारे ये बेफिजूल के सवाल उठाने से होगा भी क्या? साहेब ने आज तक किसी की नहीं सुनी तो तुम्हारी क्या खाक ही सुनेंगे। वह तो कहते भी बस अपने मन की ही बात हैं । अब अच्छी लगे तो ठीक और ना लगे तो भी ठीक। बस सुनना इसलिये जरूरी है कि डर लगा रहता है कि कहीं साहेब कुछ बंद न कर दें। कहीं नोट बंद कर दिये या लगा दिया लॉकडाउन तो फिर होना होगा परेशान, इसलिये दिल की धड़कनों को काबू में करके सुनते हैं साहेब के मन की बात। इसलिए भैया किसी के चक्कर में ना पड़ो, अपना मास्क-वास्क पहनकर खुद को बचा कर रखो। कोरोना हो गया तो परेशान खुद को ही होना पड़ेगा। ना सरकार आएगी बचाने और ना ही पड़ोस वाले। तो सड़कों पर मजमा लगाना छोड़ो और घर बैठकर टीवी पर साहेब के संदेश सुनो। ज्यादा आयं-बांय की तो कोरोना का तीर सीधा आके लगेगा फिर न कहना साहेब ने पहले बताया नहीं।

