धर्मांतरण: मसला वाकई गंभीर है …

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धर्मांतरण: मसला वाकई गंभीर है …

रंजीता सिन्हा
हमारे देश में धर्मांतरण का मसला कोई नया नहीं है। महात्मा गांधी का वो कथन याद कीजिए- मैं विश्वास नहीं करता कि एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का धर्मांतरण करे। दूसरे के धर्म को कम करके आंकना मेरा प्रयास कभी नहीं होना चाहिए। मेरा मानना है कि मानवतावादी कार्य की आड़ में धर्म परिवर्तन बीमार मानसिकता का परिचायक है। दरअसल कभी मानवता के नाम पर तो कभी गरीबी और लाचारी का फायदा उठाकर, कभी बहला-फुसलाकर तो कभी लव जिहाद के धोखे से हमारे देश में बड़ी तादाद में लोगों का धर्मांतरण कराया जाता रहा है। रही बात उत्तर प्रदेश की तो, ताजा घटनाक्रम से इस विषय की संवेदनशीलता इसलिए बढ़ जाती है, क्योंकि अब तक अधिकतर गरीब मजलूम और कम पढ़े लिखे लोग ही धर्मांतरण का शिकार होते थे, लेकिन इस बार धर्मांतरण करने वाले लोगों में पढ़े-लिखे डॉक्टर, इंजीनियर और एमबीए तक करे हुए नौजवान शामिल हैं।

गौर करने की बात यह है कि, ये सब उस प्रदेश में हुआ जहां धर्मांतरण के खिलाफ 2020 में ही एक सख्त कानून लागू कर दिया गया था, लेकिन हमारे देश में धर्मांतरण की समस्या केवल एक प्रदेश तक ही सीमित नहीं है। झारखंड मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़, केरल जैसे देश के कई राज्यों में धर्मांतरण के मामले आए दिन सामने आना एक साधारण बात है। कुछ उदारवाद के पैरोकार यह तर्क दे सकते हैं कि धर्म अथवा पंथ एक व्यक्तिगत मसला है और हर किसी को अपना धर्म चुनने का अधिकार है। इसलिए धर्मांतरण का विरोध करना बेकार की बात और महज राजनीति है। ऐसे में सवाल यह उठता है कि मूक और बधिर बच्चे भी क्या उनकी इस परिभाषा के दायरे में आते हैं? सवाल यह भी कि अगर कोई एक इंसान अपना धर्म बदलता है तो वो उसका निजी मामला हो सकता है लेकिन जब लगभग एक हजार लोग धर्मांतरण करें तो भी क्या वो निजी मामला रह जाता है? एक इंसान की आस्था बदलना उसका व्यक्तिगत मामला हो सकता है लेकिन एक हजार लोगों की आस्था में परिवर्तन निजी मामला कतई नहीं हो सकता, क्योंकि आस्था में परिवर्तन के साथ जिस धर्मांतरण को अंजाम दिया जाता है वो प्रकरण का अंत नहीं शुरुआत होती है। शुरुआत होती है एक नये सिलसिले की। एक सुनियोजित षड्यंत्र की जो शुरू तो होता है नाम बदलने के साथ लेकिन संस्कृति, व्यक्तित्व और विचार भी बदल देता है।

जब कोई अशोक, अहमद बनता है या बनाया जाता है तो सिर्फ नाम ही नहीं उसका कल्चर और पहचान भी बदल जाती है। पूजा पद्धति ही नहीं बदलती उसके त्योहार और उसकी आस्था भी बदल जाती है। अभी कुछ दिनों पहले ऐसा ही एक मामला मध्यप्रदेश में सामने आया था जब एक महिला की मौत के बाद उसके बेटे ने हिंदू रीति रिवाज से उसका अंतिम संस्कार करने से मना कर दिया था क्योंकि उसने धर्मांतरण कर लिया था। जाहिर है इस प्रकार की घटनाएं समाज पर प्रतिकूल प्रभाव डालती हैं। यही कारण है कि इस विषय में स्वामी विवेकानंद का कहना था कि एक हिंदू का धर्मांतरण केवल एक हिंदू का कम होना नहीं, बल्कि एक शत्रु का बढऩा है। और शायद उनके इस कथन का उत्तर प्रदेश के इस मामले से बेहतर कोई और उदाहरण नहीं हो सकता, क्योंकि इस मामले को देखें तो घटना का मुख्य आरोपी उमर गौतम खुद धर्मांतरण से पहले श्याम प्रसाद सिंह गौतम था जिसने लगभग एक हजार लोगों के धर्मांतरण को अंजाम दिया। इस व्यक्ति का एक तथा कथित वीडियो सामने आया है जिसमें वो स्वीकार कर रहा है कि कैसे वो खुद धर्मांतरण करके श्याम प्रसाद सिंह गौतम से मौलाना उमर गौतम बना और कैसे उसने एक हजार लोगों का धर्मांतरण करके न जाने कितने ही सौरभ को शाकिर बनाया है।

हकीकीत तो यह है कि, हमारे भारत में धर्मनिरपेक्षता और लोकतंत्र के नाम पर जिस धर्मांतरण को अंजाम दिया जा रहा है उसी धर्मांतरण को इस्लामी देशों में गैर कानूनी माना जाता है। यह जानना रोचक होगा कि इस्लामी कानून पालन करने वाले कई इस्लामी देशों जैसे सऊदी अरब, सूडान, सोमालिया जोर्डन, इजिप्ट में पंथ परिवर्तन गैर कानूनी है और इसके लिए सख्त कानूनी प्रावधान हैं। मालदीव में तो अगर कोई मुस्लिम समुदाय का व्यक्ति अपना पंथ बदलता है तो उसकी नागरिकता ही समाप्त हो सकती है।

कहने को भारत में भी धर्मांतरण रोकने के लिए कानून है जो गुजरात मध्यप्रदेश उत्तरप्रदेश उत्तराखंड झारखंड समेत देश के नौ राज्यों में लागू है। ओडिशा में तो यह 1967 से लागू है, लेकिन धर्मांतरण रोकने में यह कानून कितना कारगर है इस प्रकार की घटनाएं खुद इस बात की गवाही दे देती हैं। गवाही के साथ इस प्रकार की घटनाएं स्थिति की गंभीरता की ओर भी इशारा करती हैं। यह वाकई में चिंताजनक है कि स्वामी विवेकानंद और गांधी जी जैसे व्यक्तित्व जिस विषय की गंभीरता को सालों पहले हमारे सामने ला चुके थे वो विषय आज पहले से भी अधिक गंभीर हो चुका है। स्पष्ट है कि कानून बनाना ही पर्याप्त नहीं है उसे कठोरता से लागू करना महत्वपूर्ण है।

हालांकि, हर सिक्के के दो पहलू होते हैं उसी प्रकार धर्मांतरण के भी दो पक्ष हैं। यह पक्ष तो हम सभी के सामने है कि किस प्रकार लोगों को बहला फुसलाकर हिंदू धर्म से उनका धर्मांतरण कराया जाता है। किंतु इसका दूसरा पक्ष यह है कि जिस हिंदू धर्म से लोगों का धर्मांतरण कराया जाता है वो हिंदू धर्म इस धरती का सबसे पुराना और सनातन धर्म है। उस सनातन धर्म के निशान विश्व के हर कोने में आज भी मौजूद हैं। एटीएस द्वारा पकड़े गए उमर गौतम व मुफ्ती काजी जहांगीर काजमी ये तो बानगी मात्र है इसके पीछे कौन, क्यों है यह तो कानूनी जांच का विषय है लेकिन जो इसमें फंस रहे हैं उनकी भी समझने की आवश्यकता है, तभी इस खेल पर अंकुश लगेगा।

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