अहमदाबाद। राज्य की 15 प्रतिशत आबादी आदिवासी है। जो कि विधानसभा की 182 सीटों में से 27 सीटों पर जबरदस्त प्रभाव रखती है। इन सभी सीटों पर आजतक भाजपा कभी चुनाव नहीं जीत सकी। ये सभी सीटें कांग्रेस के पास ही रही हैं। भाजपा भले ही 20 साल से राज्य में सत्ता पर काबिज है लेकिन इन 27 विधानसभा सीटों पर जीत का सपना आज तक सपना ही रहा है। कारण आदिवासी आंख बंदकर हाथ पर वोट करते हैं। उनके लिए प्रत्याशी कोई मायने नहीं रखता। ये सिर्फ इन 27 विधानसभाओं का ही मामला नहीं है। पूरे गुजरात में आदिवासियों की सबसे पसंदीदा पार्टी आज भी कांग्रेस ही हैं। गुजरात में 15 प्रतिशत आदिवासी समाज कई उपजातियों में बंटा है। इनमें डुबला, भील, राठवा,धोडिया, गावित, वर्ली, नाइकड़ा, कोकना, धानका, चौधरी,कोली, पटेलिया (आदिवासी) हैं। ये आदिवासी मतदाता गुजरात की 182 विधानसभा सीटों में 27 सीटों पर बहुत ही खास प्रभाव रखते हैं। इनमें पांच जिलों में इनकी खासी आबादी है।
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ये जिले हैंं साबरकांठा,बनासकांठा, महिसागर, अरवल्ली, छोटा उदेपुर, पंचमकाल दाहोद, भरूच, नर्मदा, वलसाड, तापी, डांग, नवसारी और सूरत। जहां अदिवासी मतदाता जीत-हार का फैसला करते हैं। गुजरात चुनाव में आदिवासी वोटबैंक की सियासी ताकत देख सभी दल इस वोट बैंक को अपनी ओर खींचने की कवायद में लगी हैंं इस बार भाजपा और कांग्रेस के अलावा आम आदमी पार्टी भी राज्य की बीटीपी दल के जरिए इस वोटबैंक में सेंधमारी की जुगत में है। हालांकि, अभी तक गुजरात में जितने भी चुनाव हुए हैं। उनके परिणाम को देखते हुए आदिवासी वोटों की पहली पसंद कांग्रेस ही रही है। वर्ष 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव में आदिवासी मतदाताओं का 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट कांग्रेस को मिला था। जबकि 35 फीसदी वोट सत्तारूढ भाजपा को मिल सका था। जबकि 10 प्रतिशत वोट अन्य के खाते में गया। आदिवासी समाज को कांग्रेस का कोर वोटबैंक माना जाता है। पिछले कई चुनाव से ये आदिवासी कांग्रेस के पाले में ही खड़ा रहा है। 2007 के चुनाव में 27 आदिवासी बहुल सीटों में कांग्रेस ने 14 जीती थी। वहीं 2012 में 16 सीटों पर कांग्रेस ने कब्जा जमाया था। 2017 के चुनाव में कांग्रेस ने 14 सीटों पर जीत हासिल की थी। जबकि एक पर बीटीपी (भारतीय ट्राइबल्स पार्टी) जीती थी। वहीं भाजपा को इनमें से मात्र 9 पर ही संतोष करना पड़ा था।

