लोकसभा चुनाव की तारीखों का एलान किसी भी समय हो सकता है लेकिन उससे पहले चुनाव आयोग से एक बड़ी खबर आयी है। ऐसे समय जब चुनाव आयोग आम चुनाव कराने की तैयारी कर रहा है, ठीक पहले चुनाव आयुक्त अरुण गोयल ने अचानक अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया है. एक और चुनाव आयुक्त अनूप चंद्र पांडेय पिछले महीने ही रिटायर हुए हैं, इस तरह अब निर्वाचन आयोग अकेले मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार के भरोसे रह गया है. राष्ट्रपति ने अरुण गोयल का इस्तीफ़ा स्वीकार भी कर लिया है.
अरुण गोयल ने अपने इस्तीफे के पीछे कोई भी कारण नहीं बताया है, अब सवाल ये उठता है कि क्या इतना बड़ा चुनाव राजीव कुमार अकेले संपन्न कराएँगे। अरुण गोयल का अचानक इस्तीफ़ा बहुत से सवालों को जन्म दे रहा है. कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. क्या अरुण गोयल अपने आपको चुनाव आयोग में असहज पा रहे थे और किसी दबाव में थे जिससे छुटकारा पाने के लिए उन्होंने इस्तीफ़ा देना सही समझा। पिछले चार सालों को अगर देखें तो अशोक लवासा ने भी अचानक इस्तीफ़ा दिया था और उनके इस्तीफे पर भी सवाल उठे थे क्योंकि चुनाव आयोग के कई फैसलों में उनकी असहमति होती थी थी लेकिन मेजोरिटी की वजह से उनकी असहमति बेमानी हो जाती थी.
बता दें कि मोदी सरकार ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए नया कानून बनाया है और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की सिफारिश करने वाली चयन समिति से CJI को बाहर रखा गया है. चयन समिति में प्रधानमंत्री, उनके द्वारा नामित एक कैबिनेट मंत्री और नेता प्रतिपक्ष शामिल हैं. फैसला सर्वसम्मति से होना है इसलिए नेता प्रतिपक्ष के विरोध का कोई मतलब नहीं रह जाता है क्योंकि समिति में शामिल प्रधानमंत्री और उनके द्वारा नामित मंत्री फैसले को आसानी से अपने पक्ष में कर सकते हैं क्योंकि फैसला मेजोरिटी पर होगा. सुप्रीम कोर्ट का कहना था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनने वाली समिति में प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष और शीर्ष अदालत के प्रधान नयायधीश शामिल होंगे जो मोदी सरकार को मंज़ूर नहीं था और सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को कानून बनाकर पलट दिया जिसपर शीर्ष अदालत भी कुछ नहीं कर सकती थी. इन हालात में अशोक गोयल का अचानक इस्तीफ़ा लोगों को हैरान कर रहा है.

