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भ्रम-भ्रम के फेर में भ्रमित हुई सरकार, किस को ठहराऊं आंदोलन का जिम्मेदार

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भ्रम-भ्रम के फेर में भ्रमित हुई सरकार, किस को ठहराऊं आंदोलन का जिम्मेदार

सुनील शर्मा

लो जी लो करलो बात, अब साहेब कह रहे हैं किसानों डरे है, किसान भ्रमित हैं। अब किसान डरें हैं तो सड़कों पर कैसे डटे है? भ्रमित हैं तो यह भ्रम आया कहां से, किसने शुरूआत की इस भ्रम की जो किसान भ्रमित हो गये ? ये तो साहेब क्या उनकी पार्टी का कोई भी नेता बता ही नहीं रहे हैं। अब साहेब हैं, उनसे पूछे भी तो कैसे पूछें, क्योंकि सवालों का जवाब तो वह कभी देते ही नहीं हैं। वो तो पहले करते हैं, उसके बाद कहते हैं, करने से पहले पूछा तो था। अब साहब के मन की बात तो हम तभी जान सकते हैं न जब वो बताते हैं। वैसे वो बताते क्या हैं यह हम जान कर भी नहीं जान पाते। तो उन्होंने कब पूछा और किससे पूछा यह हम पूछ भी कैसे सकते हैं। वैसे तो वो न भी बताये ंतो क्या है। पता तो सबको है ही की कौन डरा रहा है और कौन भ्रम में डाल रहा है।

भईया जी, भ्रम में आज जनता भी है क्योंकि वो भी नहीं समझ पा रही की भ्रम में पड़ा किसान कैसे इतना जागरूक हो गया कि सीधा दिल्ली की ओर ही जा रहा है। और जाना ही था तो थोड़ा ठहर कर जाता। अब इतनी ठंड में जाने से पहले क्या सोचा था, साहेब खुश होगा, कानून वापस ले लेगा। अरे भाई, तुम से पूछ कर बनाया था कानून जो तुम्हारे कहने से वापस ले लें। ये साहेब के मन की बात है, मन में आई तो ला दिया कानून, अब उनको सत्ता में लाने वाले भुगतेंगे और सुनते और देखते रहेंगे उनके मन की बात।

अच्छा, साहेब और उनकी पार्टी भी तय नहीं कर पा रही कि किसानों को भ्रमित कर कौन रहा है। कभी साहेब कहते हैं विपक्ष भड़का रहा है। कभी आंदोलन की फंडिंग विदेश से करने की बात उठती है। कभी राहुल बाबा को जिम्मेदार ठहराया जाता है तो कभी मफलर वाले बाबूजी को। कभी आंदोलन में खालिस्तान समर्थक शामिल होने की बात कहते हैं तो कभी चीन और पाकिस्तान का नाम आगे कर देते हैं। भगवा बाबा ने तो कमाल ही कर दिया, किसान आंदोलन को राम मंदिर निर्माण रोकने की साजिश बता दिया। दिल्ली दंगों के आरोपियों से लेकर वामपंथी और माओवादी तक सरकार को इस किसान आंदोलन में शामिल दिख रहे हैं। सरकार को यदि कुछ नहीं दिख रहा तो वह हैं सड़क पर बैठे, ठंड से ठिठुरते और अपनी मांगों पर अड़े किसान।

अरे साहेब, सर्द रातों में जब शाम ढलने के बाद घर से निकलने की हिम्मत नहीं होती तब सड़़क पर बैठ, आग जला कर हाथ तापते हुए रात गुजारने की हिम्मत किसान ही कर सकता है। आतंकवादी तो छिपकर हमला करते हैं, सामने डट कर मुकाबला किसान ही करते हैं। और आपके मन में नहीं है तो मत मानिये इन्हें किसान, मगर इसी देश की जनता तो आपके दरवाजे पर बैठी ही है। दिन-रात आपके फैसले के इंतजार मेें बैठे लोग कोई चीन-पाकिस्तान के नागरिक थोड़े ही हैं जो भ्रम फैलाने के लिये धरना दे रहे हैं। तो आप क्यों भ्रमित हो रहे हैं। अब मान भी लिजिये की गलती हो गयी, समझाने का काम पहले करना था, कानून बाद मेें लाना था। अब कानून पहले लाये और समझाने के लिये दिल्ली से दूर जा रहे हैं। अरे साहेब किसान तो खुद समझने के लिये आपकी दर पर आये हैं। उन्हें ही समझा लिजिये तो बाकियों को समझाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी।

और लाख टके की बात साहेब, अगर किसान भ्रमित हैं तो आप तो समझदार हैं। आप इस भ्रम में क्यों हैं कि आप कर देंगे और लोग आंखें मूंद कर आपकी बात मानते रहेंगे। साहेब, यह लोकतंत्र है, यहां सवाल सुनने भी पड़ते हैं और सवालों का जवाब भी देना पड़ता है। खुद को सेवक कहने से बेहतर होगा कि जनता के प्रति जिम्मेदार बनें। यदि कोई भ्रम में है भी तो उसका भ्रम दूर करें। यह नहीं कि ठीकरा फोड़ने के लिये रोज नया सिर ढूंढते रहें। क्योंकि सरकार आप हैं, देश आपके हाथ में है और देशवासियों का विश्वास आपके साथ है। तो अपने फैसलों के लिये खुद जिम्मेदार बने और सड़कों पर बैठे लोगों को भारत का वासी। तभी उनके दर्द और परेशानी का अहसास आपको होगा और आप सही निर्णय ले पायेंगे।

चलते-चलते एक शेर अर्ज हैः
अपनी बात कहने दूर बैठों के पास क्यों जाया जाये
जो घर तक आये, चलकर उन्हें ही समझाया जाये

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