कोलकाता/नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही निर्वाचन आयोग (Election Commission) ने राज्य के प्रशासनिक ढांचे में बड़ा फेरबदल किया है। चुनाव आयोग ने निष्पक्ष और पारदर्शी मतदान सुनिश्चित करने के लिए पश्चिम बंगाल के पुलिस महानिदेशक (DGP) और कोलकाता पुलिस कमिश्नर को तत्काल प्रभाव से उनके पद से हटा दिया है।
क्यों लिया गया यह कड़ा फैसला?
आयोग का यह निर्णय विपक्षी दलों द्वारा राज्य पुलिस की निष्पक्षता पर उठाए गए सवालों और पिछली चुनावी हिंसाओं के फीडबैक के बाद आया है। PTI की एक रिपोर्ट के अनुसार, आयोग ने राज्य सरकार को निर्देश दिया है कि इन पदों के लिए तीन-तीन पात्र अधिकारियों के नाम आज शाम तक भेजे जाएं, ताकि नए नामों पर मुहर लगाई जा सके।
निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान किसी भी ऐसे अधिकारी को संवेदनशील पद पर नहीं रखा जाएगा, जिसकी निष्पक्षता पर संदेह हो या जिसका झुकाव किसी विशेष राजनीतिक दल की ओर हो।
राजनीतिक गलियारों में हलचल
चुनाव आयोग के इस फैसले ने राज्य में राजनीतिक पारा चढ़ा दिया है। ABP न्यूज़ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने इस कदम का स्वागत करते हुए इसे ‘स्वतंत्र चुनाव की दिशा में जरूरी कदम’ बताया है। वहीं, सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने इसे केंद्र सरकार के इशारे पर की गई कार्रवाई करार देते हुए सवाल उठाए हैं।
TMC के प्रवक्ताओं का तर्क है कि राज्य के वरिष्ठ अधिकारियों को हटाना संघीय ढांचे पर प्रहार है, जबकि आयोग का कहना है कि यह उनकी ‘जीरो टॉलरेंस’ नीति का हिस्सा है।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम
DGP और कमिश्नर को हटाए जाने के साथ ही, आयोग ने संवेदनशील मतदान केंद्रों पर केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (CAPF) की तैनाती को भी मंजूरी दे दी है। राज्य में पहले चरण का मतदान 21 अप्रैल को होना है, और उससे पहले प्रशासन में यह बदलाव संदेश देता है कि आयोग इस बार सुरक्षा और पारदर्शिता को लेकर किसी भी तरह का जोखिम नहीं लेना चाहता।
पृष्ठभूमि: 2021 की हिंसा से सबक
जानकारों का मानना है कि साल 2021 के विधानसभा चुनाव के बाद हुई हिंसा को देखते हुए चुनाव आयोग इस बार अतिरिक्त सावधानी बरत रहा है। पुलिस मुख्यालय (लालबाजार) में नए अधिकारियों की नियुक्ति के बाद चुनावी रैलियों और कानून-व्यवस्था की निगरानी और सख्त होने की उम्मीद है।

