- अमित बिश्नोई

कभी-कभी लाशों के ढेर इस बात की दलील बन जाते हैं कि सरकार अपनी जनता की हिफाजत नहीं कर सकी। पर्याप्त स्वास्थ्य सेवाएं देने में नाकाम रही। जिन्दगी बचाने की तैयारी और कार्ययोजना में देर कर दी। वोट देने वाली जनता की कतारें जब लाशों के ढेर की सूरत में नजर आती हैं तो गुड गवरनेंस के दावे बैड गवर्नेंस की हक़ीकत बयां करते हैं। सरकारों के नाकारेपन की नुमायश करने वाली लाशें वोट नहीं देतीं बल्कि मौजूदा हुकुमत वाली पार्टी को वोट ना देने की हिदायत देती हैं।
मुर्दों और जिन्दों में बहुत अंतर होता है। खासकर सियासी दुनिया में तो जिन्दों को रिझाने और मुर्दों को छिपाने की कारीगरी आनी ही चाहिए है। रैली में ज्यादा से ज्यादा लोगों को इकठ्ठा करना और जितने इकट्ठा हुए उससे ज्यादा बताने का हुनर किसी राजनीति पार्टी की फितरत होती है। और ऐसी पार्टी को जिन्दों की भीड़ इकट्ठा करने की कामयाबियों के बाद जब सत्ता की जिन्दगी मिल जाए तो इसे दूसरा हुनर दिखाना पड़ता है। फिर ये मुर्दों की भीड़ को छिपा देने, कम कर देने या लाशों की कतारों की चर्चा को ही मुर्दा बनाने में लग जाते हैं।
बंगाल चुनाव और तमाम चुनाव के अलावा यूपी में पंचायत चुनाव के बाद कोरोना ने मौत की आंधी ला दी। पश्चिम बंगाल में रैलियों में भीड़ का दावा करने वाली भाजपा और आउट ऑफ कंट्रोल कोरोना से आई मौत की आंधी पर पर्दा डालने की कोशिश कर रही है। खासकर उत्तर प्रदेश में ऐसा कुछ ज्यादा ही हो रहा है। लखनऊ के बैकुंठ धाम श्मशान को टीन के परदों से ढकने की बात हो या खबरों को भ्रामक बताकर डराने की कोशिश हो।
इस मामले में केजरीवाल सरकार भी कुछ पीछे नहीं है, वहां भी सरकारी और असली आंकड़ों में काफी बड़ा घपला निकलकर सामने आया है, इसी तरह अन्य प्रदेशों की सरकारें भी लाशों को छुपाने का खेल खेल रही हैं.
इतना प्रयास कोरोना को काबू करने या स्वास्थ्य व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए किया जाता तो शायद कड़वी सच्चाई वाली खबरें खुद ब खुद कम हो जातीं।
हर संभव कोशिश की जा रही है कि बुरी तरह बेकाबू कोरोना संक्रमण की तबाही की चर्चा को खामोश कर दिया जाए। लाशों की गिनती और मौत पर मातम भी ना हो। रोते-बिलखते, तड़पते और फरियाद करती आम जनता की बेबसी पर पर्दे डाल दाए जाएं। लेकिन ये सच कैसे छिप सकता हैं। श्मशान-कब्रिस्तान में लाशों की कतारें झूठ नहीं बोलतीं। गली-मोहल्लों, कॉलोनियों और अस्पतालों के बाहर मौत की रूदन को खामोश नहीं किया जा सकता। सिलेंडर के लिए भटकते परिजनों की कतारों के मंजर सबको नजर आ रहे हैं। ऑक्सीजन के लिए सांसें उखड़ने की सिसकियां कोईनहीं सुन ले, इसके लिए किसी कान बंद नहीं किए जा सकते। किसी की आंखों पर पट्टी नहीं बांधी जा सकती।
खबरें रोकी जा सकती हैं लेकिन हकीकत बयां करते मंजर तो दिखेंगे ही। और ये सब याद रखा जाएगा। सरकारी प्रेस नोट, झूठे दावे-गलत आंकड़े और मीटिंगों , आदेशों, निर्देशों और जमीनी हकीकत में फर्क अदम गोंडवी की पंक्तियां याद दिला रहा है-
तुम्हारी फाइलों में गांव का मौसम गुलाबी है,
मगर ये आंकड़े झूठे हैं ये दावा किताबी है।

