लखनऊ/देहरादून। उत्तराखंड की राज्यपाल बेबी रानी मौर्य के इस्तीफा देने के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश में किसी अहम पद की जिम्मेदारी दिये जाने की बात यूं ही नहंी है। बेबी रानी मौर्य न केवल पिछड़े से समाज से आतीं हैं बल्कि नारी स्वाभिमान और सशक्तिकरण की एक मिसाल भी हैं। उत्तर प्रदेश चुनाव में उनकी भूमिका भाजपा के लिए साकारात्मकतौर पर काफी महत्वपूर्ण हो सकती।
इन दिनों यूपी में नारी सुरक्षा को मुद्दा बनाने को प्रयासरत विपक्षी दलों के लिए भी यह झाटका साबित हो सकता है, क्योंकि बेबी रानी मौर्य काई समान्य नारी नहीं बल्कि वह साल 1996 में सामाजिक कार्यों के लिए समाज रत्न, साल 1997 में उत्तर प्रदेश रत्न और 1998 नारी रत्न सम्मान से सुशोभित हो चुकीं हैं।
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इतना ही नहीं उनका कॅरियर देखें तो वह साल 1995 से साल 2000 तक आगरा की महापौर, साल 1997 में वर्तमान राष्ट्रपति और तत्कालीन प्रेसिंडेंट राष्ट्रीय अनुसूचित मोर्चा राम नाथ कोविंद के साथ ट्रेसरार के रूप में कार्य कर चुकीं हैं। साल 2001 में प्रदेश, सामाजिक कल्याण बोर्ड की सदस्य और साल 2002 में वह राष्ट्रीय महिला आयोग की भी सदस्य रह चुकीं हैं।
ताजा खबर के मुताबिक, उन्होंने प्रेसिंडेंट को अपना इस्तीफा दे दिया है। राज्यपाल के सेके्रटरी बीके संत ने इसकी तस्दीक की है। बेनी रानी मौर्य बतौर उत्तराखंड की राज्यपाल बीते 26 अगस्त को अपने तीन वर्षों का कार्यकाल पूरा कर चुकी हैं। दो दिनों पूर्व नई दिल्ली में उन्होंने होम मिनिस्टर अमित शाह के साथ मुलाकात की थी। इसी के बाद से ही उनके त्यागपत्र देने की चर्चाएं आम थीं। फिलहाल उत्तर प्रदेश बीजेपी में अहम जिम्मेदारी दिये जाने बात आम है।
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पिछले दिनों जब वह मीडिया से मुखातिब हुईं थीं तो उन्होंने महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के मुद्दों पर अपनी बात रखी थी। उनका मानना है कि, प्रदेश की महिलाएं मेहनती, स्वाभिमानी और जुझारू हैं।

