Gujrat chunavi dangal:- गठबंधन के लिए दल तलाशने में जुटे असुद्दीन ओवैसी

गुजरात चुनावGujrat chunavi dangal:- गठबंधन के लिए दल तलाशने में जुटे असुद्दीन ओवैसी

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गुजरात के सियासी रण में अभी सिर्फ आप, भाजपा और कांग्रेस की चर्चा हो रही थी। लेकिन ऑलइंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) प्रमुख असुद्दीन ओवैसी ने गुजरात की राजनीति में शिरकत करने का मन बना लिया है और अपनी पार्टी के साथ गठबंधन करने के लिए दल तलाशना आरम्भ कर दिया है। पहले यह गुजरात विजय का उद्देश्य लिए बीटीपी के साथ गठबंधन करने का मन बनाए हुए थे लेकिन अरविंद केजरीवाल ने गुजरात जाकर इनके मंसूबो पर पानी फेर दिया और आप का बीटीपी के साथ गठबंधन हो गया।

एआईएमआईएम प्रमुख असुद्दीन ओवैसी को ऐसा प्रतीत होता था कि बीटीपी उनके लिए बेहतर विकल्प साबित होगी और गुजरात मे सत्ता परिवर्तन करने में अहम भूमिका भी निभाएगी। लेकिन ओवैसी का यह सपना टूट गया और इस दल ने आप के प्रस्ताव को स्वीकारा। वास्तव में अगर हम ओवैसी की नीतियों को समझे तो इनका उद्देश्य अन्य दलों की भांति गुजरात के आदिवासी समाज को अपनी ओर करना है। इन्होंने आदिवासी वोट बैंक पर हाँथ मारने के लिए गठबंधन का विकल्प बीटीपी को चुना था। लेकिन अब जब यह आप के साथ है तो गुजरात मे ओवैसी की राह और मुश्किल हो गई है।

क्या है ओवैसी की नीति:-

अगर हम ओवैसी की नीतियों की बात करें तो यह एक ही नीति पर चलते हैं मुस्लिम हितैषी। एआईएमआईएम प्रमुख असुद्दीन ओवैसी और यूपी के मुखिया योगी आदित्यनाथ में यह एक समानता है कि यह अपने आप को सच्चा मुसलमान कहते हैं और वह अपने आप को सच्चा हिन्दू। यह दोनो किसी विशेष धर्म के साथ खुद को जोड़े हुए हैं। ओवैसी खुद को मुस्लिम हितैषी और धर्मनिपेक्ष बताते हुए अन्य दलों की आलोचना करते हैं और कहते हैं कि अन्य सभी दल सत्ता सुख में रहते हैं और मुस्लिम का शोषण करते हैं। 

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गुजरात मे क्या है ओवैसी का हाल:- 

अगर हम गुजरात की राजनीति में एआईएमआईएम प्रमुख असुद्दीन ओवैसी की बात करें तो इनकीं कुछ खास धमक नहीं है। हम इन्हें गुजरात की राजनीति में महज वोट काटने वाला कीड़ा समझ सकते हैं जो अन्य दलों के वोट बैंक को प्रभावित कर सकता है। ओवैसी की मुस्लिम हितैषी नीतियों के चलते गुजरात मे इनका काफी विरोध हुआ है और यहां इनके काफिले को रोककर ओवैसी वापस जाओ के नारे लगाए गए थे व इनके काफिले को काले झंडे भी दिखाए गए थे। तो अब इन सब गतिविधियों को देखते हुए यह स्पष्ट है कि गुजरात मे ओवैसी की राह काफी कठिन है और यह सफर उनके लिए कांच के टुकड़ों पर कदम रखकर चलने सा होगा।

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