2017 का इतिहास दोहराएगी भाजपा या विपक्ष को मिलेगा किसान आंदोलन और जाटों की नाराजगी का लाभ

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2017 का इतिहास दोहराएगी भाजपा या विपक्ष को मिलेगा किसान आंदोलन और जाटों की नाराजगी का लाभ

अमित बिश्‍नोई

मेरठ। West UP Election 2022: आगामी 10 फरवरी को प्रदेश में विधानसभा चुनाव के पहले चरण के लिए मतदान होगा। जिसमें पश्चिमी यूपी के 11 जिलों के 58 सीटों पर 623 उम्मीदवारों के भाग्य का फैसला यहां के मतदाता करेंगे। इससे पहले 2017 के विधानसभा चुनाव में इन 58 सीटों में से 53 सीटों पर भारतीय जनता पार्टी ने जीत दर्ज की थी। इस बार भी पश्चिम की इन सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज करने के लिए पूरा जोर लगाया हुआ है। वहीं दूसरी ओर सपा-रालोद गठबंधन भी इस बार पूरे दमखम के साथ मैदान में है। पिछले चुनाव में सपा को 2 और रालोद को सिर्फ एक सीट पर ही संतोष करना पड़ा था। हालांकि पिछली बार जाटों और किसानों ने भाजपा के लिए जमकर ईवीएम दबाया था। 2017 में भाकियू के राकेश टिकैत खुलकर भाजपा के समर्थन में थें, लेकिन इस बार भाजपा के लिए स्थितियां बदली हुई हैं। इस बार किसान भाजपा से नाराज हैं इसी के साथ किसान संगठन भी भाजपा के खिलाफ झंडा उठाए हुए हैं। किसानों की मांग है कि लखीमपुर कांड मामले में मोदी सरकार के मंत्री और सांसद अजय मिश्र उर्फ टेनी पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई।

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ये था 2017 का चुनावी परिणाम और समीकरण :

साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को प्रचंड बहुत मिला था। पश्चिमी उप्र की शामली, मुजफ्फरनगर, बागपत, मेरठ, गाजियाबाद, गौतमबुद्ध नगर, हापुड़, अलीगढ़, बुलंदशहर, आगरा और मथुरा की 58 सीटें शामिल हैं। इन 58 सीटों पर आगामी 10 फरवरी को मतदान होना है। 2017 में इन्हीं 58 में से 53 पर 2017 में भाजपा ने जीत हासिल करते हुए विपक्षी पार्टियों का सूपड़ा साफ कर दिया था। प्रदेश की बड़ी क्षेत्रीय पार्टियों समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के खाते में 2-2 सीटें गईं थी,तो रालोद को मात्र एक सीट पर संतोष करना पड़ा था। रालोद का ये विधायक भी बाद में भाजपा में शामिल हो गया था। रालोद ने 2017 में पश्चिमी यूपी के 23 जिलों में 100 सीटों उम्मीदवार खड़े किए थे।

कुल कितने प्रत्याशी मैदान में हैं और चुनौतियां ?

साल 2017 में हुए विधानसभा चुनाव के मुकाबले इस बार दलों की चाल और स्थानीय स्तर पर वोटों का समीकरण बदल गया है। 2017 में भाजपा ने प्रचंड जीत हासिल की थी, लेकिन इस बार भाजपा के सामने 2017 का रिपोर्टकार्ड दोहराने की चुनौती है। किसान आंदोलन, लखीमपुर खीरी कांड के अलावा जाट आरक्षण और पचिमी किसानों के अन्य मुददों के चलते भाजपा के प्रति भारी नाराजगी है। जिससे पश्चिमी उप्र के वोटरों का मिजाज बदला सा नजर आ रहा है और इसी का राजनैतिक लाभ सपा और रालोद गठबंधन उठाना चाहता है। वहीं, बसपा और कांग्रेस के प्रत्याशी अलग से चुनावी मैदान में ताल ठोक रहे हैं। इस बार इन 58 सीटों पर 623 प्रत्याशी अपना भाग्य आजमा रहे हैं जिसका फैसला मतदाता 10 फरवरी को करेंगे और नतीजे 10 मार्च को आएंगे। इतना ही नहीं पहले चरण में मैदान में उतरे करीब 46 प्रतिशत प्रत्याशी करोड़पति हैं। उम्मीदवारों की औसतन आय 3.72 करोड़ रुपये है। 156 प्रत्याशियों पर आपराधिक मामले चल रहे हैं।

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किसान आंदोलन का किसे मिलेगा फायदा?

तीन कृषि कानून के खिलाफ किसान आंदोलन का गढ़ पश्चिमी उत्तर प्रदेश रहा है। विपक्षी पार्टियों का मानना है कि वेस्ट यूपी से चुनाव शुरू होने से किसानों की नाराजगी का भारतीय जनता पार्टी को नुकसान और गैर भाजपा दलों खासकर सपा और रालोद गठबंधन को फायदा हो सकता है। ऐसी स्थिति में भारतीय जनता पार्टी को अपनी सीट बचाने और गैर बीजेपी दलों को अधिक सीट पाने की जंग में जोर आजमाइश करनी होगी।

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