कल रात हमारे पडोसी देश और एशिया कप के मेज़बान श्रीलंका ने 6 विकेट से हराकर हमें ऐसा झटका दिया है कि डर लगने लगा है कि कहीं इसका असर आने वाले टी 20 विश्व कप में न पड़े. भारत की इस हार ने यह साबित कर दिया कि दिव्पक्षीय श्रंखलाओं में कामयाबी मिलना और बात है लेकिन अंतराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में सफलता अलग बात, फिर यह तो एशिया कप था और इसे पूरी तरह से अंतर्राष्ट्रीय टूर्नामेंट भी नहीं कह सकते। तो सवाल यही उठता है कि बाइलेटरल सीरीजों में झंडे गाड़ने वाली टीम को आखिर बड़े टूर्नामेंटों में क्या हो जाता है? पिछले टी-20 विश्व कप में दिल तोड़ने वाला प्रदर्शन करने के बाद हमने कई देशों के खिलाफ खूब मुकाबले जीते मगर एशिया कप में कामयाबियों का वो सिलसिला फिर टूट गया. अभी एशिया कप के बाद हम फिर ऑस्ट्रेलिया और दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ टी 20 श्रंखला खेलेंगे, शायद जीतेंगे भी मगर क्या उस जीत को हम टी20 विश्व कप में बरकरार रखेंगे। खैर यह अलग टॉपिक है फिलहाल कल की हार का थोड़ा पोस्टमॉर्टेम करते हैं।
कहाँ से शुरू करू और कहाँ पर ख़त्म। अगर पूरे मैच पर नज़र डालें और हार का अगर एक कारण तलाशें तो सामने एकबार फिर 19वां ओवर ही नज़र आता है जो इन दिनों भुवनेश्वर के नाम पेटेंट हो चूका है. 19वां ओवर भुवनेश्वर की पहचान बन गया है, काश यह पहचान अच्छी यादों के लिए होती, काश 19वां भारत की हार का नहीं जीत की वजह बना होता। भरोसा अच्छी बात है लेकिन जब भरोसा एक ज़िद के रूप में नज़र आने लगे तो उसका रूप अलग हो जाता है. क्या हम इसे रोहित शर्मा की ज़िद मानें कि 19वां ओवर तो भुवी ही फेंक सकते हैं और कोई नहीं, भले ही आपकी यह ज़िद टीम को हार दिला रही हो और आपकी कप्तानी पर सवाल भी उठा रही हो. या फिर हम इसे ऐसा भी कह सकते हैं कि डेथ ओवरों के विशेषज्ञ माने जाने वाले भुवनेश्वर कुमार का ज़माना अब जाता रहा. वजह कुछ भी हो भुवनेशवर की 19वे ओवर में लगातार नाकामी ने एशिया कप में भारत को शर्मसार ही किया है।
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अगर हम भुवनेश्वर को दोषी मानते हैं तो कप्तान रोहित शर्मा भी इस जुर्म के बराबर के हक़दार हैं. द्विपक्षीय श्रंखलाओं में कप्तानी का अद्भुत रेकॉर्ड रखने वाले रोहित जब उससे आगे बढे तो नाकाम नज़र आये. मैच में उन्होंने अपने शानदार बल्लेबाज़ी से जो नाम कमाया, कहीं न कहीं बाद में फील्डिंग के दौरान उसे गँवा दिया। श्रीलंका के दोनों सलामी बल्लेबाज़ जब जमकर बल्लेबाज़ी कर रहे थे हमारे दोनों पेसर नाकाम हो रहे थे, तो पावर प्ले में अश्विन को क्यों नहीं try किया। अश्विन भी एक मिस्ट्री बॉलर ही माने जाते हैं, श्रीलंका ने पूरे एशिया कप में तीक्ष्णा को पावर प्ले में आज़माया और कामयाबी हासिल की मगर हमारी फीयरलेस क्रिकेट अजीब है कुछ भी अलग करने से डरती है, क्या फीयरलेस क्रिकेट का मतलब सिर्फ चौके छक्के मारना ही होता है, गेंदबाज़ी फीयरलेस नहीं हो सकती। इस मैच में हमारे स्पिनर्स ही प्रभावी नज़र आये, चहल और अश्विन ने मिडिल ओवर्स में श्रीलंका के चार विकेट ताबड़तोड़ निकाल कर पडोसी देश को बड़ा झटका दिया, क्या उस समय दीपक हुड्डा की ऑफ़ स्पिन का इस्तेमाल नहीं हो सकता था, हुड्डा के एक या दो ओवर अच्छे निकल जाते तो हो सकता कि अंत में हमारे तेज़ गेंदबाज़ों के पास ज़्यादा रन होते डिफेंड करने को. अर्शदीप ने जिस तरह दो मैचों में अंतिम ओवर में गेंदबाज़ी की, अगर उसे सात रन की जगह 12-15 मिलते तो पाकिस्तान को भी हराते और श्रीलंका को भी।
हालाँकि रोहित शर्मा को भी इस बात का एहसास था कि हुड्डा को आज़माना चाहिए लेकिन उनके हिसाब से टीम को 10-15 रन और बनाने चाहिए थे. बात सही है मगर क्या 173 का स्कोर कम होता है? दरअसल वह अपनी गलतियों को बहानों में छुपाना चाह रहे थे. भारत अब लगभग बाहर हो चूका है, फाइनल की सम्भावना न के बराबर है. अब सवाल एशिया कप के बाद क्या होगा, इसका है. विश्व कप से पहले क्या अभी भी आने वाली दो सीरीजों में प्रयोग जारी रहेंगे या एक टीम का खाका तय होगा। बहुत से सवाल हैं जो ज़हन में मगर उनका जवाब क्या हो सकता है बड़ा मुश्किल है. कुछ सवाल हरभान सिंह ने उठाये हैं और वह सिलेक्शन को लेकर हैं. दीपक चाहर को जब आप अपना बेस्ट बॉलर मानते हो तो एशिया कप में उसकी जगह रिज़र्व खिलाडियों में क्यों? उमरान की तेज़ी पर फ़िदा होने वाले सेलेक्टर्स ने उसे क्यों भुला दिया. 37 साल के कार्तिक अगर टीम में हैं तो क्यों नहीं खेल रहे है? ऐसे अनगिनत सवाल हैं जिनके जवाब लोग मांग रहे हैं. एशिया कप में हार के बाद सेलेक्टर्स की मुश्किलें बढ़ने वाली हैं यह तो तय है लेकिन भुवनेश्वर जैसे गेंदबाज़ों की मुसीबतें बढ़ेंगी इसके बारे में कहा नहीं जा सकता। मेरठ का यह सितारा जो टीम इंडिया की जीत का हीरो हुआ करता था एशिया कप में ज़ीरो साबित हुआ. आखिर में बस इतना ही कहूंगा कि हाय रे 19वां ओवर…

