Thursday, October 21, 2021
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विकास दुबे एनकाउंटर : कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है

एक को कफन और तमाम राज दफन

कई सवाल छोड़ गया दुर्दांत का अंत

अमित बिश्‍नोई

आठ पुलिसकर्मियों की हत्या करने के बाद सात दिन तक कई राज्यों की पुलिस की आँखों में धूल झोंककर हजारो किमी का सफर तय करके कानपुर से उज्जैन जाकर सरेंडर करने वाले दुर्दांत आतंकी विकास दुबे को मुठभेड़ में मारकर सरकार और पुलिस भले ही अपनी पीठ थपथपा रही हो,लेकिन इस मुठभेड़ और जुर्म के असली साम्रज्य का सच कुछ और ही है। जो विकास की मौत के साथ ही चिता में जलकर राख हो गया। इस पूरी कहानी में सिर्फ इतनी बात ही काफी है कि एक को कफन और सारे राज दफन?


गौरतलब है कि विकास दुबे जन्म से अपराधी नही था,बल्कि जिस वक्त उसने जरायम की दुनिया में कदम रखा तो उसके सरपरस्त और संरक्षक उसे बढ़ावा देने में लग गए यानी अपराध और सियासत का ऐसा गठजोड़ हुआ कि फिल्मों का शौकीन विकास पर्दे की रुपहली दुनिया को दिमाग में उतारकर जुर्म की दुनिया में उतरता चला गया। वक़्त के साथ साथ विकास जरायम की बुलंदियों पर पहुँच गया और उसके सामने टिकने की हिमाकत खाकी और खादी के लोग भी नही कर सके। जिसकी बानगी उसने थाने के अंदर एक भाजपा नेता की हत्या करके दिखाई। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार शायद ही कोई ऐसा अवैध काम हो,जिसमें विकास की हिस्सेदारी न हो। हालांकि जिस दिन यह वारदात हुई और उसने आठ पुलिसकर्मियों की जान ली,उससे पहले तक विकास को कोई जानता नही था।

लेकिन बीते सात दिनों में उसके तीन दशक के अपराध का साम्राज्य खाक हो गया। गुरुवार को उज्जैन में विकास द्वारा सरेंडर करने पर सरकार और यूपी पुलिस की जमकर किरकिरी हुई,जिसे दबाने के लिए शुक्रवार की सुबह विकास का एनकाउंटर कर दिया गया। लेकिन जिस शख्स की टाँगों में रॉड पड़ी हो और निहत्थे गार्ड के सामने सरेंडर कर रहा हो,क्या वो एसटीएफ से पिस्टल छीनकर भाग जाएगा। जो कंपनी दावा करती हो कि उसकी गाड़ी गड्ढो में भी नही पलटती,वह साफ सुथरी सड़क पर पलट जाएगी और वो भी ऐसे कि गाड़ी के शीशे भी न टूटे। खैर यह तो पुलिस की स्क्रिप्ट है, जो नई नही काफी पुरानी है। इससे अलग हटकर सियासत पर बात करते है। कई वर्ष पूर्व जब विकास दुबे को मुम्बई में गिरफ्तार किया गया तो उसने स्पष्ठ अल्फाजो में कहा था कि क्षेत्रीय नेताओ का संरक्षण ही उसे बचाता है और वो बदले में उनके काम आता है। ऐसे में क्या सरकार की जिम्मेदारी नही बनती कि उन संरक्षकों को बेनकाब करे जो विकास जैसे जुर्म की दुनिया के दुर्दानतो को पालते है। इन सब सवालो के पीछे हालांकि विकास दुबे का समर्थन नही है। लेकिन सरकार की ठोको वाली मुहिम न्याय पालिका और लोकतंत्र की हत्या है। गौर करने वाली बात यह है कि काफी अर्से के बाद इस मुठभेड़ को लेकर विपक्ष हमलावर हुआ,जबकि इससे पहले भी मुठभेडों का सिलसिला चल रहा है।

यूँ समझ लीजिए


“शोर ये बेसबब नही गालिब
कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है”


पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के ट्वीट पर अगर सोचो तो गाड़ी नही पलटती तो सरकार पलट जाती। यह इस बात का संकेत है कि विकास की पहुँच सत्ता की गोद तक है और उसके लिए जरूरी है कि उस शख्स को सार्वजनिक किया जाए,जिसकी गोद में विकास पलता रहा। लेकिन तमाम सवाल विकास की मौत के साथ ही समाप्त हो गए। क्योंकि ट्रिगर की उंगलियों पर योगी का फरमान और आदेश एनकाउंटर.

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