अमित बिश्नोई
हरियाणा में कांग्रेस पार्टी के पास राज्यसभा चुनाव में अपने प्रत्याशी अजय माकन को जिताने के लिए पर्याप्त संख्या में नंबर थे लेकिन हरियाणा में कांग्रेस पार्टी के सर्वेसर्वा पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का मैनेजमेंट नाकाम रहा और पार्टी उम्मीदवार को हार का सामना करना पड़ा. वह न तो नाराज़ कुलदीप बिश्नोई को मना पाए और न ही कांग्रेस के बाक़ी विधायकों को ठीक से मैनेज कर पाए. बता दें कि कुलदीप बिश्नोई ने क्रॉस वोटिंग की और पार्टी के एक विधायक ने कुछ ऐसा किया कि उसका वोट चुनाव आयोग ने रद्द कर दिया, अगर वो वोट भी रद्द न होता तो अजय माकन की जीत हो जाती।
अजय माकन का सामना बीजेपी समर्थित मीडिया मुग़ल कार्तिकेय शर्मा से था और इनके मैदान में उतरने से ही खरीद फरोख्त के कयास लगाए जाने लगे थे और इसलिए कांग्रेसी विधायकों को रिसोर्ट में छुपाया गया था, कुलदीप बिश्नोई तो कांग्रेस से पहले से ही नाराज़ थे लेकिन राज्यसभा में उनकी पार्टी से नाराज़गी इस बात की थी कि हरियाणा से बाहरी उम्मीदवार क्यों उतारा, उनकी नाराज़गी ख़त्म करने की और मनाने की ज़िम्मेदारी भूपिंदर हुड्डा को मिली थी मगर वह कुलदीप बिश्नोई को कन्विंस नहीं कर पाए, हालाँकि कल वोटिंग के बाद कांग्रेस मानकर चल रही थी कि कुलदीप बिश्नोई ने अजय माकन को वोट किया हैं, क्योंकि वोटिंग से पहले की रात उन्हें हुड्डा के साथ देखा गया था. यहाँ पर एकबात जो बेहद ख़ास है कि कार्तिकेय शर्मा के पिता विनोद शर्मा जो केंद्र में मंत्री रह चुके हैं भूपिंदर हुड्डा के बहुत ख़ास मित्रों में बताये जाते हैं, तो अब लोग सवाल उठा रहे हैं कि अजय माकन की हार में कहीं दोस्ती ने तो कोई भूमिका अदा नहीं की।
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इसके अलावा बिकने वाले विधायकों को मालूम है कि व्हिप के उल्लंघन से कैसे बचा जा सकता है, जिस विधायक की करतूत से वोट रद्द हुआ है उसे अनजाने में की गयी भूल भी कह सकते हैं और सोच समझकर की गयी भूल भी. अभी यह सामने नहीं आया है कि कांग्रेस के किस विधायक का वोट रद्द हुआ, लेकिन माकन के हार की असली वजह यही वोट है, यहाँ भी भूपिंदर हुड्डा को ज़िम्मेदार माना जा सकता है. या तो वह उस विधायक को यह समझा नहीं सके कि राज्यसभा के चुनाव वोटिंग के दौरान क्या क्या एहतियात बरतनी पड़ती हैं या फिर वो उस विधायक को बाहर संपर्क करने से नहीं रोक सके। खैर यह सब जल्द ही पता भी चल जायेगा कि किसने किया और क्यों किया लेकिन कांग्रेस पार्टी का मिस मैनेजमेंट एकबार फिर खुलकर सामने आ गया।
वहीँ राजस्थान में खांटी नेता अशोक गेहलोत ने एकबार फिर साबित कर दिया कि तलवार की धार पर सरकार कैसे चलाई जाती है, गेहलोत ने पार्टी के तीनों उम्मीदवारों को जीतकर एक तरह कांग्रेस पार्टी की इन चुनावों में लाज रख ली। मीडिया हस्ती सुभाष चंद्रा की इंट्री के बाद कांग्रेस के तीसरे उम्मीदवार प्रमोद तिवारी की राह काफी मुश्किल लग रही थी, भाजपा ने अपने सारे बचे हुए 30 वोट सुभाष चंद्रा को ट्रांसफर कर दिए थे, इस बात की पूरी सम्भावना थी कि मीडिया टाइकून बाकी के नबरों को आसानी से मैनेज कर लेंगे। भाजपा चाहती तो उसके पास इतने सरप्लस वोट थे कि वो अपना उम्मीदवार उतारकर मुकाबले को मुश्किल बना सकती थी लेकिन बिना हॉर्स ट्रेडिंग ऐसा संभव नहीं होता और उसने इसी लिए राजस्थान और हरियाणा दोनों जगह पर मीडिया मुगलों को अपना समर्थन दिया ताकि उसपर हॉर्स ट्रेडिंग का कोई इलज़ाम न लगे जिसे आने वाले गुजरात और हिमाचल प्रदेश के विधानसभा चुनावों में विपक्ष मुद्दा बना सके।
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भाजपा हरियाणा में तो कामयाब हो गयी मगर राजस्थान में उसे मुंह की खानी पड़ी और शायद इसलिए कि हरियाणा में हुड्डा थे और राजस्थान में अशोक गेहलोत। दोनों जगहों पर मीडिया मुग़ल थे लेकिन राजस्थान वाले को नाकामी मिली और हरियाणा वाले को कामयाबी। आप ऐसा भी कह सकते हैं हुड्डा को नाकामी मिली और गेहलोत को कामयाबी, यह राजनीति की भाषा है और इस भाषा का प्रभाव और सन्देश दूर तक जाता है। कामयाबी और नाकामी के इस सन्देश का असर हरियाणा और राजस्थान के अगले विधानसभा चुनावों में भी नज़र आ सकता है। ध्यान रखने वाली बात यह है कि हरियाणा के पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी के पक्ष में बह रही हवा को यही हुड्डा जी अपने पक्ष में नहीं कर पाए थे और दूसरी तरफ अशोक गेहलोत अंदुरुनी और बाहरी दोनों मुकाबलों पर अपने विरोधियों को पस्त करते हुए सरकार चला रहे हैं और अब राज्यसभा चुनाव में साबित कर दिया कि राजनीति इसे कहते हैं।

