बुलडोज़र के नीचे कहीं दब तो नहीं गए अंकिता की हत्या के सबूत

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देवभूमि उत्तराखण्ड की चर्चा इन दिनों अंकिता हत्याकांड से हो रही है. वैसे तो यह हत्या भी अन्य हत्याओं की तरह ही है लेकिन इस हत्या के पीछे जो कारण, जो लोग और जो कार्रवाई नज़र आ रही है उसने इसे एक हाई प्रोफाइल घटना बना दिया। आम तौर पर किसी भी हत्या की जांच एक रूटीन के हिसाब से चलती है, कई हफ्ते तो यही तय करने में लग जाते है कि हत्या हुई है, हत्या के कारण और आगे की जांच, दोषियों की गिरफ्तारी, एक लम्बा प्रोसेस होता है लेकिन इस केस में जिस तेज़ रफ़्तार से सबकुछ घट रहा है वो भी अपने आप में कई सवालों को जन्म दे रहा है. बेशक किसी भी हत्याकांड कि ऐसे ही तेज़ी के साथ जांच होनी चाहिए और दोषियों को भी पकड़ा जाना चाहिए लेकिन इतनी तेज़ी से आरोपी के उस रिसोर्ट पर बुलडोज़र चला दिया जाय जिस जगह पर अंकिता एक रिसेप्शनिस्ट के रूप में काम कर रही थी और जहाँ पर इस हत्याकांड की पटकथा की शुरूआत हुई थी, जहाँ से इस हत्याकांड का कारण पैदा हुआ उस जगह को बुलडोज़र से इतनी जल्दी ढहाकर उत्तराखण्ड की भाजपा सरकार क्या साबित करना चाहती थी, क्या ये सिर्फ लोगों की नाराज़गी को शांत करने की ही बात थी या फिर इसके पीछे कोई और कारण, क्योंकि घटना के पीछे जो आरोपी बताये जा रहे हैं उनका सम्बन्ध सत्ताधारी भाजपा से ही है.

अंकिता के घरवालों ने भी बुलडोज़र कार्रवाई पर सवाल खड़ा किया है, बल्कि वो तो स्पष्ट रूप से धामी सरकार पर आरोप लगा रहे हैं कि रेसोर्ट पर बुलडोज़र चलवाकर सरकार सबूतों को मिटाना चाह रही है, हालाँकि सरकार सफाई दे रही है कि उसने बुलडोज़र सिर्फ बाहरी हिस्से पर चलाया है लेकिन सवाल उठता है क्यों? रिसोर्ट के बाहरी हिस्से को तोड़कर आप क्या सिद्ध करने की कोशिश कर रहे थे, जांच टीम उस समय क्या कर रही थी, क्या पुलिस को इतना नहीं पता कि जो जगह किसी हत्याकांड से जुडी हो उसके साथ छेड़छाड़ नहीं करना चाहिए। माना कि लाश नहर से बरामद हुई है लेकिन पुलिस ये कैसे भूल गयी कि कहानी रिसोर्ट से ही शुरू हुई थी. अंकिता के घरवाले अगर सवाल उठा रहे हैं तो उसमें गलत कुछ भी नहीं। 

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इस हाई प्रोफाइल हत्याकांड से पहले यूपी में भी लखीमपुर में एक हत्याकांड हुआ था, कई लोग मरे थे, मगर सरकार की नींद तब खुली थी जब राजनीतिक दलों ने उसे एक बड़ा मुद्दा बना दिया था, यहाँ पर तो किसी के मुद्दा बनाये बिना ही सरकार इतनी फ़ास्ट ट्रैक पर पहुँच गयी. आप इस तेज़ी के लिए धामी सरकार की तारीफ भी कर सकते हैं लेकिन इसी तेज़ी में धामी की खामी भी छुपी हो सकती है जिसकी ओर अंकिता का परिवार इशारा कर रहा है, बोल रहा है. इस खामी का खुलासा भी इस हत्याकांड की तरह ज़रूर होगा, कि देवभूमि पर सत्ता के करीबियों के अवैध रिसोर्ट कैसे बने और इन अवैध रिसॉर्ट्स में क्या क्या हो रहा है, अंकिता की हत्या से सब सामने आने लगा है.

इस त्वरित कार्रवाई पर “कुछ तो पर्दादारी है” वाली बात फिट बैठती नज़र आती है, भाजपा भी उतनी ही तेज़ी से एक्शन में आयी जितनी तेज़ी से बुलडोज़र एक्शन में नज़र आया, आरोपी बेटे के साथ बाप को भी पार्टी से बर्खास्त कर दिया, पद छीन लिए. आरोपी के पिता पूर्व राज्यमंत्री रह चुके हैं, भाई को राजयमंत्री का दर्जा मिला हुआ है. और सभी के साथ पार्टी का एक जैसा व्यवहार जबकि अभी पोस्टमॉर्टेम रिपोर्ट भी पूरी नहीं आयी है लेकिन भाजपा ने अपनी कार्रवाई पूरी कर दी. सच में हैरानी तो होती ही है, वरना पता नहीं इस तरह के कितने केस हैं जहाँ आरोपी शान के साथ पार्टी में मौजूद हैं. फिर आर्य फैमिली के साथ इतनी जल्दबाज़ी क्यों? बहरहाल अंकिता को इन्साफ मिले इससे बड़ी और अच्छी बात और कोई नहीं हो सकती लेकिन इस हत्याकाण्ड में अभी जो दिख रहा है शायद उससे कुछ अलग भी है जो समय आने पर ज़रूर सामने आएगा। आखिर में बस एक ही बात कि सत्ता से जुड़े लोगों के खिलाफ आम तौर पर इतनी त्वरित कार्रवाई होती नहीं है और जब होती है तो फिर संदेह भी उठता है.

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