शहर की कहानी

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शहर की कहानी

अनूप मणि त्रिपाठी

हम किस शहर में रहते हैं?

सवाल ही गलत है।

सवाल यह नहीं होना चाहिए कि हम किस शहर में रहते हैं। सवाल यह होना चाहिए कि हम कैसे शहर में रहते हैं। आज हमारे शहर की पहचान क्या है? क्या यह कि जहां शोर इस कदर बढ़ गया है कि सन्नाटे रात को भी नहीं आते! या यह कि यहां का रहवासी इतना सभ्य हुआ या यूं कहें कि शहर ही जंगल हुआ कि जंगल से अब आदमखोर नहीं आते! या फिर यह कि यहां अट्टालिकाएं गंगनचुंबी हुईं कि कई छतों पर रवि महाराज नहीं विराजते। कुछ पल के लिए भी नहीं…

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क्या इसी शहर पर हम इतारते हैं! क्या कभी ऐसे ही शहर की कल्पना की थी हमने! स्टेशन से बाहर निकले हुए जब कोई शहरी किसी गांववाले को कुरता-धोती पहने,कंधे पर गमछा डाले देखता है, तो सोचता है कि यह भी आ गए यहां मरने! भीड़ बढ़ाने को! ठीक वैसे ही, जैसे कभी किसी शहरी ने इस वाले शहरी को स्टेशन से बाहर निकलते देख कभी सोचा था। अभी इन्हीं खयालों में डूबता-उतराता था कि शहर को मैंने अपने सामने से जाते देखा। सहसा विश्वास न हुआ। यह तो वही बात हो गई कि शैतान का नाम लो और शैतान हाजिर। मैंने शहर को रोककर यह वाली कहावत उसे सुना दी। शहर ठठाकर हंसा। मगर मैं गंभीर रहा। वजह थी अखबार में छपी एक खबर। उस खबर का हवाला अब हमारे बीच होने वाले संवादों में आने वाला था।

मैंने शहर से पूछा,‘कल रात फुटपाथ पर बच्चा भूख से रोता रहा और तू घोड़ा बेचकर सोता रहा!’ शहर मुझे घूरने लगा। संकेत साफ थे। उसे इस बाबत कुछ भी पता नहीं। मैंने अखबार उसके आगे बढ़ा दिया। शहर ने उड़ती नजरों से वह खबर पढ़ी। अखबार मुझे थमाते हुए लापरवाही से बोला,‘यार ,दिन भर का थका था। बिस्तर पर एक बार जो गिरा तो गिरा,फिर कुछ नहीं पता था। तू यह समझ जैसे की मैं मरा था।’ ‘मैं जानता हूं कि कल रात भी तूने पी रखी होगी,नहीं तो मासूम का रोना सुनकर झट खिड़कियां बंद कर ली होगीं।’ मेरी इस बात में दम था । वरना शहर अभी तक शोर मचाने लगता। शहर कुछ पल को शांत रहा। यकीन नहीं होता न! मगर वह शांत था, जैसे किसी भयानक विस्फोट के बाद कुछ पल की खामोशी। शहर के शांत होने की वजह भी मुझे जल्द ही समझ आ गई। शहर बोला,‘मुझे ऐसी नजरों से मत देखो।

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मेरा इसमें कोई कसूर नहीं। मुझे नींद से अगर जगाना ही था,तो उस भूखे बच्चे को जोर से चिखना-चिल्लाना था न!’ शहर की सफाई सुनकर मैं सोच में पड़ गया। यह इसकी क्रूरता कही जाए या उसका भोलापन या हाजिरजवाबी! मैं अभी सोच ही रहा था कि शहर चलने को हुआ। शहर के पास इतना समय कहां! मैंने उसे रुकने का इशारा किया, मगर वह नहीं रुका। वह जितना भी रुक गया,वही बहुत था मेरे लिए, वरना शहर हम जैसों के लिए रुकता ही कहां है! जाते हुए शहर को मैंने जोर से कहा,‘अरे पगले, जोर लगाने के लिए भी तो जोर चाहिए। मैं समझ गया, तुझे सिसकियां नहीं शोर चाहिए।’

कह नहीं सकता शहर मेरी बात सुन पाया कि नहीं,क्योंकि मेरे देखते ही देखते शहर भागने लगा था।

मित्रो! शहर की यह कहानी आज की नहीं,कल की नहीं बरसों पुरानी है। फुटपाथ पर भूख से व्याकुल बच्चा रोता है और शहर आराम से सोता है। और मासूमों-मजलूमों की सिसकियां शहर के तेज खर्राटों में खो जाती हैं। अगली सुबह शहर जगता है,काम पे चलता है, दिन ढलता है, शाम होती है,रात आ जाती है और वही पुरानी कहानी एक बार फिर ताजातरीन होकर हमारे सामने आ जाती है।

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जानते हैं कल रात शहर में क्या हुआ?

कल रात भी भूख से व्याकुल बच्चा रोता रहा… रोता रहा… रोता रहा… और शहर सोता रहा…सोता रहा… सोता रहा…

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