आम पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल इन दिनों भाजपा से ज़्यादा कांग्रेस पर मेहरबान हैं, ये मेहरबानी प्यार के रूप में नहीं बल्कि हमलों के रूप में हो रही है जो अब व्यक्तिगत होते जा रहे हैं . कभी वो देश की सबसे पुरानी पार्टी को ख़त्म बताते तो कभी उसे बात करने के काबिल नहीं मानते तो कभी कांग्रेस पार्टी के सर्वमान्य नेता राहुल गाँधी पर सीधा हमला करते हुए कहते हैं बर्बाद गुलिस्तां करने को बस ही उल्लू काफी है, यानि वो सीधे तौर पर यह कहते हैं कि कांग्रेस पार्टी को बर्बाद करने के लिए राहुल अकेले काफी हैं, किसी और को बर्बाद करने की क्या ज़रुरत।
अरविन्द केजरीवाल को एक महत्वकांक्षी नेता माना जाता है जिसने अपने गुरु को भी धोखा दिया। गुरु को तो आप जानते ही होंगे जिनके नेतृत्व में भ्रष्टाचार के खिलाफ दिल्ली में लोकपाल आंदोलन चला था और जिसे पूरी तरह गैर राजनीतिक कहा गया था, यह अलग बात है कि वह विशुद्ध रूप से राजनीतिक था. केंद्र से यूपीए सरकार को हटाना ही उसका मकसद था. केजरीवाल को भी अन्ना का मकसद शायद मालूम था और इसलिए उन्होंने भी इस आंदोलन को एक अवसर के रूप में लिया और आंदोलन ख़त्म होते है अन्ना अपने गाँव और केजरीवाल ने बाकी सारे लोगों को जिनमें बड़े बड़े नाम थे मिलाकर राजनीतिक संगठन खड़ा कर लिया, यह अलग बात है कि आम आदमी पार्टी धीरे धीरे एक खास आदमी की पार्टी बन गयी और वो बड़े बड़े नाम अलग होते चले गए या फिर अलग कर दिए गए.
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खैर बात केजरीवाल की कांग्रेस और राहुल पर मेहरबानी को लेकर हो रही थी. तो फिलहाल इस मेहरबानी की दो वजह मुझे समझ में आ रही हैं, एक तो गुजरात चुनाव और दूसरा कांग्रेस पार्टी की “भारत जोड़ो यात्रा” की बढ़ी लोकप्रियता हालाँकि इसका भी कनेक्शन गुजरात के चुनाव से ही है. कांग्रेस पार्टी गुजरात में पिछले 27 सालों से विपक्ष में है बावजूद इसके उसका लगभग 37-38 प्रतिशत वोट आज भी गुजरात में एकजुट है. केजरीवाल का सपना गुजरात फ़तेह कर देश के तीसरे राज्य में सत्ता हथियाने का है और केजरीवाल को अच्छी तरह मालूम है कि उसकी राह का सबसे बड़ा रोड़ा कांग्रेस पार्टी ही है. केजरीवाल की चुनावी रणनीति के जानकार अच्छी तरह जानते हैं कि वो जब चुनाव में जाते हैं तो विपक्षी पार्टी को फिनिश ही बताते हैं, गोवा में भी वो ऐसा कह चुके हैं और अब गुजरात में भी वो ऐसा ही कर रहे हैं। कांग्रेस और राहुल पर बढ़ते हमलों की यही वजह है.
केजरीवाल को अच्छी तरह मालूम है कि अभी गुजरात में भाजपा से सीधी टक्कर लेने की उनकी हैसियत नहीं है. केजरीवाल खुद भी कहते हैं कि वो पहले चुनाव हरवाते हैं , फिर खुद हारते हैं और उसके बाद जीत के लिए जाते हैं. गुजरात में केजरीवाल फिलहाल कांग्रेस को हरवाने का खेल खेल रहे हैं, अगले चुनाव में शायद हारने का खेल खेलें और उसके बाद जीतने का. इधर राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी की “भारत जोड़ो यात्रा” आगे बढ़ रही है और साथ ही लोगों में उसका समर्थन भी बढ़ रहा है. इस यात्रा की लोकप्रियता से भाजपा गुजरात से ज़्यादा 2024 के लिए चिंतित है और लगातार इसे कांग्रेस तोड़ो यात्रा में बनाने के लिए प्रयासरत है, गोवा इसकी ताज़ा मिसाल है. लेकिन केजरीवाल की परेशानी गुजरात है, भले भारत जोड़ो यात्रा गुजरात से होकर नहीं गुज़र रही है लेकिन उसकी ख़बरें तो गुजरात में गश्त ही कर रही हैं.
केजरीवाल को चिंता इसी बात की है कि अगर वह गुजरात में कांग्रेस को हराने के खेल में नाकाम हो गए तो उनकी आगे की रणनीति पर इसका बुरा असर पड़ेगा। फिलहाल केजरवाल की तमाम कोशिशों के बावजूद भी गुजरात में नहीं लग रहा कि वो सात आठ प्रतिशत से ज़्यादा वोट हासिल कर सकते हैं, वैसे अभी काफी समय शेष है, भारत जोड़ो यात्रा चल ही रही है, इधर आम पार्टी के नेता लगातार भ्रष्टाचार के मामलों में फंसते जा रहे हैं, कुछ तो जेल में भी हैं और कुछ जाने की तैयारी कर रहे हैं. दिल्ली की AAP सरकार भी शराब के ठेके और बसों की खरीद के मामलों में केंद्रीय एजेंसियों के निशाने पर है. पंजाब में भी अपराध का ग्राफ सरकार बनते ही तेज़ी से ऊपर भागा है. तो कहने का मतलब ये कि हमेशा दूसरी पार्टियों को घेरने वाली आम आदमी पार्टी अब खुद भी घिर रही है. लोग ईमानदारी का दावा करने वाली पार्टी से सवाल पूछने लगे हैं. मोहल्ला क्लिनिक और स्कूलों की असलियत भी धीरे धीरे खुलने लगी है. सबसे बड़ी बात बयानों से हमेशा मुस्कान बिखेरते केजरीवाल का दम्भ भी लोगों के सामने खुलने लगा है. देखना है कि दम्भी बयान अभी और कितनी रफ़्तार पकड़ेंगे लेकिन बहुत रफ़्तार से चलने वाली गाड़ी के एक्सीडेंट का खतरा भी बहुत ज़्यादा होता है.

