Congress को राहुल से ज़्यादा प्रियंका पर भरोसा जताने की ज़रुरत

आर्टिकल/इंटरव्यूCongress को राहुल से ज़्यादा प्रियंका पर भरोसा जताने की ज़रुरत

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अमित बिश्नोई
हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस पार्टी की सरकार बन गयी है, बड़े लम्बे समय बाद कांग्रेस पार्टी के लिए कोई अच्छी खबर आयी है, बड़े समय बाद किसी राज्य में कांग्रेस की रणनीति भाजपा की नीतियों पर भारी पड़ी है, बड़े समय बाद कांग्रेस ने भाजपा को हराया है, बड़े समय बाद ज़्यादा सीटें जीतने के बाद कांग्रेस पार्टी शपथ ग्रहण तक पहुंची है. हिमाचल की जीत कांग्रेस पार्टी के लिए निराशा के दौर में आशा की ऐसी किरण है कि जिसकी रौशनी में आगे बढ़ने की राह मिल सकती है. हिमाचल की जीत इस मायने में और भी महत्वपूर्ण हो जाती है जब साथ ही में हुए चुनाव में उसे प्रधानमंत्री मोदी के गुजरात में बुरी तरह हार मिली। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने कल ही गुजरात में जीत का सेहरा मोदी को दिया तो सवाल उठता है कि कांग्रेस पार्टी हिमाचल में जीत का सेहरा किसे देगी? इस सवाल पर एक ही नाम सामने नज़र आता है और वह है कांग्रेस पार्टी की महासचिव प्रियंका गाँधी वाड्रा का.

प्रियंका गाँधी के ज़िम्मे इसबार हिमाचल प्रदेश की पूरी ज़िम्मेदारी थी, चुनावी रणनीति बनाने से लेकर टिकट वितरण तक. लोगों के मन मस्तिष्क में हिमाचल की समस्याओं को पहुँचाने से लेकर पार्टी को जीत की मंज़िल पर पहुँचाने तक और फिर सबसे बड़ी बात, सरकार गठन को लेकर सबमें समन्वय बनाने तक, हर जगह प्रियंका गाँधी ने अपनी मौजूदगी का एहसास कराया। राजनीति से जुड़ा हर व्यक्ति जानता है कि कांग्रेस पार्टी में चुनाव जीतने के बाद सरकार के गठन में कितनी समस्या आती है, गुटबाज़ी अपने चरम पर पहुँच जाती है और यही वजह है कि गोवा जैसे राज्य में वो अनुकूल परिस्थितियों के बावजूद भी सरकार नहीं बना पाती। लोगों को यह भी मालूम है कि भाजपा को चुनाव हारने के बाद भी सरकार बनाने की कला आती है लेकिन इसबार जिस तरह से प्रियंका गाँधी ने सारे मामलों को हैंडल किया उसने भाजपा को अपनी उस कला की महारत दिखाने का कोई मौका नहीं दिया. हालाँकि भाजपा नेताओं ने इस तरह की बातों की शुरुआत ज़रूर की थी कि विधायकों को संभालना कांग्रेस पार्टी का काम है और प्रियंका गाँधी ने विधायकों को अच्छी तरह से संभाला।

दरअसल पूरे चुनाव अभियान की अच्छी बात यह रही कि प्रियंका गाँधी को अकेले ही सारे फैसले करने का अधिकार दिया गया. कांग्रेस पार्टी ने दरअसल हिमाचल और गुजरात में दो प्रयोग किये। गुजरात में जहाँ उसने अपने टॉप नेताओं को प्रचार से अभियान से दूर रख बिना शोरशराबे की रणनीति अपनाई, अपवाद स्वरुप राहुल गाँधी एक दिन के गुजरात गए ज़रूर थे लेकिन वो प्रचार अभियान का हिस्सा नहीं थे. वहीँ हिमाचल में सारी ज़िम्मेदारी प्रियंका पर छोड़ दी गयी जो उनके लिए एक कड़ी परीक्षा थी. कांग्रेस का इसमें से एक प्रयोग नाकाम हो गया जबकि दूसरे प्रयोग में प्रियंका गाँधी पूरी तरह सफल रहीं।

प्रियंका गाँधी ने जबसे एक्टिव पॉलिटिक्स में हिस्सा लेना शुरू किया हिमाचल प्रदेश उनका पहला राजनीतिक असाइनमेंट कहा जा सकता है. हालाँकि उनके नेतृत्व में उत्तर प्रदेश का पिछले विधानसभा चुनाव ज़रूर लड़ा गया लेकिन सभी को मालूम था कि यूपी में 30 वर्षों से सत्ता से बाहर कांग्रेस के लिए वहां कोई मौका नहीं था और फिर राजनीतिक समीकरण भी ऐसे बन गए थे कि चुनाव सीधा भाजपा और सपा के बीच होकर रह गया था, इसके बावजूद भी अगर प्रचार अभियान की बात कहिये या फिर रणनीतिक तौर पर सरकार को घेरने वाले मुद्दों को उठाने की बात कहिये तो प्रियंका गाँधी पूरी तरह कामयाब रही थी, यूपी के चुनाव में प्रियंका ने एक तरह से एजेंडा सेट किया था, चाहे लखीमपुर का मामला हो, चाहे लॉकडाउन में मज़दूरों के पैदल घर वापसी का मामला हो, हर मुद्दे पर प्रियंका ने सरकार को कामयाबी से घेरा। लोगों का मानना था कि प्रियंका की मेहनत का फायदा अखिलेश को मिला। बहरहाल यूपी चुनाव की बागडोर संभालने से जो राजनीतिक अनुभव प्रियंका ने हॉसिल किया वो हिमाचल में काम आया.

हिमाचल प्रदेश में चुनाव जीतने के बाद पूर्व मुख्यमंत्री दिवंगत वीरभद्र सिंह की पत्नी और कांग्रेस सांसद रानी प्रतिभा सिंह ने मुख्यमंत्री पद के लिए खुद की दावेदारी पेश की थी और जिस तरह अपने समर्थकों के ज़रिये लगातार शक्ति प्रदर्शन कर आला कमान पर दबाव बनाने का प्रयास किया था उसे खूबसूरती से हैंडल करना आसान काम नहीं था लेकिन प्रियंका गाँधी की राजनीतिक कुशलता से कांग्रेस पार्टी के लिए एक बड़ी समस्या बन रही यह बगावत ठंडी पड़ गयी और हिमाचल में कांग्रेस सरकार का गठन संभव हो सका. तो आप कह सकते हैं कि राजनीतिक कौशल में प्रियंका अपने भाई पर भारी पड़ती हैं, ज़रुरत है उनपर पूरा भरोसा जताने और उन्हें और बड़ी ज़िम्मेदारियाँ देने की. अगले साल कई राज्यों के चुनाव हैं जिनमे दो भाजपा और दो कांग्रेस शासित राज्य हैं. कांग्रेस पार्टी को इन चुनावों में राहुल से ज़्यादा प्रियंका पर भरोसा जताने की ज़रुरत है.

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