रालोद की महापंचायतों के मंच से भाकियू ने बनाई दूरी
यूपी और उत्तराखंड में चक्का जाम न करना भाकियू की रणनीति
सुनील शर्मा
न्यूज डेस्क। आपकी अपनी वेबसाइट बिजनेस बाइट्स ने 31 जनवरी को प्रकाशित किये गये आर्टिकल ”क्या किसान आंदोलन को हाईजैक होने से बचा पायेगी भाकियू!“ मेें किसान आंदोलन मे बढ़ती राजनीतिक सक्रियता के मुद्दे को उठाया था। उक्त आर्टिकल में साफ तौर पर कहा गया था कि किसान आंदोलन का नेतृत्व कर रही और स्वर्णिम दौर से गुजर रही भाकियू को राजनीतिक दलों को अपने मंच से दूर रखना चाहिये। वरना किसान आंदोलन का नेतृत्व और श्रेय राजनीतिक दलों के हाथ में जाते हुए देर नहीं लगेगी और भाकियू इस आंदोलन में अपना सर्वस्व झोंक देने के बाद भी खाली हाथ रह जायेगी। इसके बाद से भाकियू ने किसान आंदोलन को समर्थन देने वाले राजनीतिक दलों का आभार तो व्यक्त किया मगर उनको अपने मंच पर स्थान देने से परहेज ही किया। वहीं इस आंदोलन के जरिये वेस्ट यूपी के किसानों में पैंठ बनाने का प्रयास कर रही रालोद से भी भाकियू नेता दूरी बना रहे हैं। बताया जा रहा है कि शनिवार को यूपी और उत्तराखंड को चक्का जाम से मुक्त रखने के पीछे भी रालोद और सपा की बढ़ती सक्रियता थी जिसकी लगाम थामने के लिये भाकियू ने यह रणनीति बनाई थी।
गौरतलब है कि केंद्र सरकार द्वारा पारित कृषि कानूनों के विरोध में मुजफ्फरनगर में बुलाई गयी महापंचायत में मंच पर मौजूद रालोद नेता जयंत चैधरी ने भाकियू, खाप पंचायतों और किसानों को अपने पक्ष में करने का पूरा प्रयास किया। वहीं सपा के नेता भी मंच से केंद्र सरकार और पीएम मोदी पर निशाना साधकर खुद को किसान हितैषी साबित करते नजर आये। रालोद नेता जयंत चैधरी ने तो उत्साह में आकर नमक-लोटा लेकर खापों को कसम देने का प्रयास भी किया। इसी दौरान भाकियू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश टिकैत मंच से रालोद को समर्थन कर बैठे। भाकियू के मंच से मिली राजनीतिक संजीवनी से उत्साहित रालोद ने पूरे प्रदेश में महापंचायत बुलाने का सिलसिला शुरू कर दिया जिसको सफलता भी मिल रही है। ऐसे में भाकियू को अहसास होने लगा है कि यदि रालोद और सपा की सक्रियता ऐसे ही बढ़ती गयी तो किसान आंदोलन का नेतृत्व उनके हाथ से निकलने में देर नहीं लगेगी। वहीं किसान आंदोलन का स्वरूप राजनीतिक होते जाने से भी भाकियू की चिंता बढ़ गयीं।
ऐसे में अब भाकियू ने राजनीतिक दलों को मंच पर स्थान देने और उनके मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने से परहेज करना शुरू कर दिया है। मथुरा में हुई रालोद की महापंचायत में नरेश टिकैत के बेटे गौरव टिकैत अवश्य पहुंचे लेकिन इसके बाद बड़ौत में हुई महापंचायत से भाकियू के वरिष्ठ नेताओं ने दूरी बनाये रखी। शामली के भैंसवाल में हुई महापंचायत में चैधरी नरेश टिकैत के छोटे भाई नरेंद्र टिकैत शामिल जरूर हुए मगर उनकी मौजूदगी बतौर भाकियू नेता नहीं बल्कि खाप प्रतिनिधि के रूप में थी। एक वायरल वीडियो में भाकियू प्रवक्ता राकेश टिकैत ने तो रालोद की भैंसवाल महापंचायत को लेकर जानकारी होने से भी इंकार कर दिया। इससे यह माना जा रहा है कि भाकियू किसान आंदोलन की आग में किसी राजनीतिक दल को रोटियां सेकने की इजाजत देने वाली नहीं है।
बात सिर्फ यहीं तक नहीं है बल्कि शनिवार को किसान संगठनों द्वारा पूरे देश में चक्का जाम के ऐलान के बाद भाकियू नेता राकेश टिकैत ने यूपी और उत्तराखंड को इस चक्का जाम से मुक्त रखने का ऐलान किया था। बताया जा रहा है कि भाकियू को इस बात का अहसास था कि दोनों प्रदेशों के किसान भाकियू के आह्वान पर चक्का जाम करेंगे लेकिन अति सक्रियता दिखा रही रालोद के साथ सपा और कांग्रेस इसका श्रेय लेने का पूरा प्रयास करेंगे। ऐसे में यूपी और उत्तराखंड में चक्का जाम न करने के ऐलान की वजह राजनीतिक दलों को भाकियू की ताकत का अहसास करना था जो कि हुआ भी। भाकियू के समर्थन के बिना रालोद, सपा और कांग्रेस बड़ा प्रदर्शन तक नहीं कर पायी। जिससे यह भी संदेश गया कि रालोद की महापंचायत में उमड़ी भीड़ किसान समर्थक तो है लेकिन सभी लोग रालोद समर्थक नहीं है। वहीं सपा और कांग्रेस को भी भाकियू की इस रणनीति से खासा धक्का पहुंचा है।
अब देखना होगा कि आने वाले समय में भाकियू कैसे खुद और किसान आंदोलन को राजनीतिक दलों की इच्छापूर्ति का साधन बनने से रोक पाती है। वहीं किसान आंदोलन की कमान अपने हाथों में संभाले हुए किस प्रकार आंदोलन को सफलता की ओर ले जाती है। वहीं भाकियू के बदले रूख से परेशान राजनीतिक दलों की अब रणनीति क्या होगी यह तो आने वाले समय में ही दिखेगा लेकिन यह तय है कि भाकियू के साथ के बिना यूपी में किसान वोट बैंक का राजनीतिक लाभ उठाना फिलहाल किसी दल के लिये संभव नहीं दिख रहा है।

