अमित बिश्नोई
नई दिल्ली। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी हमें छोड़कर चले गए. भारतरत्न प्रणब दा देश के ऐसे प्रथम नागरिक रहे हैं जो वाकई नागरिक थे. देश के लिए उनके योगदान का लेखा जोखा बनाना इतना आसान नहीं है. क्योंकि उनका राजनीतिक जीवन 50 साल से भी लंबा रहा. इतने लंबे दौर में उन्होंने लगभग हर महत्त्वपूर्ण मंत्रालय संभालीं. लेकिन विश्वस्तर पर उन्हें सबसे ज्यादा पहचान भारत के वित्तमंत्री के रूप में मिली. खासतौर पर 2008 की भयावह मंदी से बाहर निकालने में जिस तरह मनमोहन सिंह के अर्थशास्त्रीय हुनर को याद किया जाता है उसी तरह मंदी से उबारने के काम के क्रियान्वयन के लिए प्रणब मुखर्जी का नाम लिया जाता है. वैश्विक मंदी के उस भयावह दौर में प्रणब मुखर्जी ही देश के वित्तमंत्री थे. विश्व पटल पर वे तब भी छाए रहे जब अक्तूबर 2008 में अमेरिका के साथ धारा 123 के तहत ऐतिहासिक समझौता हुआ था. याद किया जाना चाहिए कि अमेरिकी विदेश सचिव कोंडोलीज़ा राइस के साथ प्रणब मुखर्जी ने ही समझौते पर दस्तखत किए थे. वह एटमी करार भारत के आर्थिक भविष्य के मद्देनज़र आज भी बहुत बड़ी घटना मानी जाती है.
जानते थे चुनौतियों से निपटना
आर्थिक क्षेत्र में प्रणब दा की भूमिका का लेखा-जोखा बताना हो तो यह भी नहीं भूला जा सकता कि वे विश्वबैंक, एशियाई विकास बैंक और अफ्रीकी विकास बैंक के प्रशासनिक बोर्ड के सदस्य भी रहे. उन्नीस सौ 90 के दशक में वे पांच साल योजना आयोग के उपाघ्यक्ष रहे थे. यानी आर्थिक क्षेत्र में देश के सामने खड़ी चुनौतियों से निपटने और भाविष्य के लिए नींव डालने में प्रणब मुखर्जी के योगदान को आज जरूर याद किया जाना चाहिए.
जब पहली बार बने वित्तमंत्री
पंद्रह जनवरी 1982 को प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जब उन्हें वित्तमंत्री बनाया, उस समय इंदिरा गांधी के सामने भाविष्य की एक मजबूत अर्थव्यवस्था खड़ी करने की चुनौती थी. देश की जनता ने भारी बहुमत के साथ कांग्रेस को फिर से सत्ता सौंपी थी. कांग्रेस के सामने देश के अधूरे पड़े काम थे. और उनमें सबसे बड़ा काम आर्थिक मोर्चे को साधना था. तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को एक ऐसे व्यक्ति की जरूरत थी जो सिर्फ आर्थिक मामलों का ही जानकार न हो बल्कि उसमें राजनीतिक अर्थशास्त्र की भी समझ हो. यानी जो लोकतंत्र की जरूरत को भी समझता हो. इस काम के लिए कलकत्ता यूनिवर्सिटी से राजनीतिशास्त्र में परास्नातक और आर्थिक मामलों से संबधित कई मंत्रालयों और संस्थाओं में काम कर चुके प्रणब मुखर्जी की तरफ देखा गया और उन्हें वित्तमंत्री बनाया गया था. गौरतलब है कि उस समय तक देश में हरितक्रांति और श्वेतका्रंति हो चुकी थी. अनाज और दूघ के मामले में देश आत्मनिर्भर हो चुका था. अब औद्योगिक क्रांति की बात सोची जाने लगी थी. बहरहाल, प्रणब मुखर्जी को लगभग तीन साल वित्तमंत्री रहने का मौका मिला और उन्होंने बखूबी वह जिम्मेदारी निभाई और आगे के लिए बहुत कुछ जाना समझा, जिसे बाद में हम तब देखते हैं जब बीस साल बाद यानी यूपीए सरकार में उन्हें एकबार फिर वित्तमंत्री बनाया गया. तब तक वे देश की उत्पादक गतिविधियों का प्रत्यक्ष अनुभव हासिल कर चुके थे.
दूसरी बार और बेहतर प्रदर्शन
अस्सी के दशक से लेकर बीसवीं सदी के दूसरे दशक तक प्रणब मुखर्जी की भूमिका बहुविध रही. उन्होने देश के कई महत्त्वपूर्ण मंत्रालयों को संभाला और देश की जरूरतों को समझा. इसीलिए जब सन 2009 में यूपीए दूसरी बार सत्ता में आया तो प्रणब मुखर्जी की आर्थिक और राजनीतिक समझ और अनुभव की शिद्दत से जरूरत महसूस की गई. गौरतलब है कि वह वैसा समय था जब दुनिया अचानक भयावह मंदी में आ गई थी. दुनिया के किसी भी देश को कुछ नहीं सूझ रहा था. इघर देश में मनमोहन सिंह दूसरी बार प्रधानमंत्री बनाए गए थे. खुद अर्थशास्त्री होने के नाते अगर मनमोहन सिंह ने अपना वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी को बनाया तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि मुखर्जी मे उन्होंने क्या देखा होगा. आज याद भी किया जा सकता है कि विश्व में सबसे ज्यादा चर्चित हो चुकी ग्रामीण रोजगार योजना के लिए धन का अच्छा खासा प्रावधान करनेे में प्रणब मुखर्जी जो हुनर दिखाया वह चकित करने वाला था. वरना आमतौर पर वित्तमंत्री से किसी योजना के लिए जितना मांगा जाता है उसे पूरा का पूरा कोई वित्तमंत्री दे नहीं पाता. लेकिन वे प्रणब मुखर्जी ही थे जिन्होंने मनरेगा का सिर्फ आर्थिक पहलू ही नहीं देखा था बल्कि इस योजना की लोकतांत्रिक नैतिकता को भी समझा था. भले ही तब न समझा गया हो लेकिन आज जब प्रणब दा हमारे बीच नहीं है तो मनरेगा के महत्त्व को लेकर उनकी सोच को याद जरूर किया जाना चाहिए.
खाद्य सुरक्षा कानून का खाका खींचा
भारतीय लोकतंत्र के एक चमत्कारिक कानून का विचार भले ही कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के दिमाग की उपज हो लेकिन इसका नक्शा बनाने का जिम्मा प्रणब मुखर्जी को ही सौंपा गया था. इस बारे में विद्वानों के बीच कहा जाता है कि कोई अकादमिक अर्थशास्त्री होता तो वह खर्चे का हिसाब ही लगाता रह जाता लेकिन अकादमिक राजनीति शास्त्री होने के नाते प्रणब मुखर्जी इस कानून को लेकर दुविधा में नहीं रहे. भले ही उनके वित्तमंत्री रहते यह कानून पास नहीं हो पाया था लेकिन आगे जबजब इस कानून का जिक्र आएगा तब-तब प्रणब मुखर्जी को याद करना ही पड़ेगा. गौरतलब है कि प्रणब मुखर्जी विधि स्नातक भी थे.
बेजोड़ काबिलियत
सन 1969 में राजनीति में आए मुखर्जी को जल्द ही अहमियत मिलने लगी थी. सन 1982 में जब इंदिरा गांधी ने उन्हें वित्तमंत्री बनाया तो यह कहा जाने लगा था कि इंदिरागांधी सरकारी कामकाज के लिए उन्हें सबसे काबिल सहयोगी मानती हैं. 1990 के दशक के बाद के वर्षों में तो उन्हें कांग्रेस का संकट मोचक भी कहा जाने लगा. उनकी हैसियत का अंदाजा लगाना हो तो याद दिलाया जा सकता है कि लगभग हर जीओएम यानी हर मंत्रिसमूह में उनकी मौजूदगी रहा करती थी. इसी तरह जव कालेधन की समस्या के निवारण के लिए टास्क फोर्स बनाया गया तो इस समस्या की नापतोल का जटिल काम उन्हीं को सौंपा गया था. इतना ही नहीं, अब तक की सबसे जटिल संहिता यानी डायरेक्ट टैक्स कोड 1961 को सरल बनाने की अबतक जितनी भी कोशिशें हुई हैं उनमें मुखर्जी की कोशिशों को हमेशा याद किया जाता है. इस मामले में आगे जब कभी भी कोई काम करना पड़ेगा तो प्रणब मुखर्जी के सुझावों पर गौर जरूर करना पड़ेगा.
लोकतंत्र की अच्छी समझ
प्रणब मुखर्जी अपने राजनीतिक करियर में कितने भी व्यस्त रहे हों लेकिन उन्होंने अपने गांव को खुद से हमेशा जोड़े रखा. हाल ही में एक दिलचस्प घटना घटी थी. अपने बेटे से अपने गांव से उन्होंने कुछ मंगाया तो वह कटहल था. वे हर साल अपने गांव जरूर जाते थे. कई कई दिन बड़े शौक से गांव में रहते थे. यानी अगर किसी को प्रणब मुखर्जी की अच्छी राजनीतिक समझ के कारणों को जानना हो तो उसमें एक बड़ा कराण यही निकल कर आएगा कि आखिर आखिर तक उन्होंने गांव से नाता नहीं छोड़ा. इसीलिए तो कहा गया है कि वे ऐसे प्रथम नागरिक रहे हैं जो वाकई नागरिक थे.

