सुन रहा है न तू रो रहे है हम

आर्टिकल/इंटरव्यूसुन रहा है न तू रो रहे है हम

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सुन रहा है न तू रो रहे है हम

सुनील शर्मा

साहेेब अब तो सुन लो हमारी गुहार, अपनों को खोने का विलाप, सुन लो साहेब, रो रहे हैं हम और आप अब भी कह रहें हैं कि डरने की नहीं है बात, सरकार है आपके साथ। अरे साहेब सरकार साथ है तो दिख क्यों नहीं रही हमारे पास? क्यों अस्पतालों के बाहर लोग अपनेे मरीज को भर्ती कराने के लिये गुहार लगा रहे हैं? सरकार है तो ऑक्सीजन तक क्यों नहीं मिल पा रही मरीजों को,क्यों जा रही है उनकी जान बिना ऑक्सीजन के? अरेे साहेब अगर सरकार है तो पहले क्यों नहीं जागी, क्यों नहीं बचाई जिंदगियां, क्यों टूूटने दिये परिवार? अरे साहेब, चुनाव तो बाद में भी हो जाते मगर ये जो जिंदगियां खो गयीं हैं क्या उनको वापस ला सकते हैं आप, क्या आपके नाकारा सिस्टम में उनकी हत्याओं की जिम्मेदारी लेने का साहस है।

सुन रहा है न तू रो रहे है हम

जी हां साहेब, ये कोरोना से मौत नहीं, नाकारा सिस्टम द्वारा की गयी हत्याएं हैं। वो सिस्टम जो लोगों को इलाज तक नहीं दिला पाया, वो सिस्टम जो उखड़ती सांसों को ऑक्सीजन का सहारा तक नहीं दे पाया, वो सिस्टम जो ब्लैक में दवाओं-इंजेक्शनों को बिकने से नहीं रोक पाया। अरे साहेब, वो सिस्टम जो आपने बनाया है और जिसकी जिम्मेदारी भी आपकी है। यही सिस्टम हत्यारा है लोगों की मौत का।

सुन रहा है न तू रो रहे है हम

अरे साहेब आपके मन की बात हमने खूब सुनी, अब अगर हिम्मत है तो हमारे मन की बात भी सुनकर हमारे दर्द को महसूस करने की कोशिश करें। हालांकि आपके लिये मुश्किल जरूर होगा क्योंकि आप हमेशा कहते हैं, कभी किसी की सुनी होती तो आज देश के ये हालात न होते। तो साहेब, जब लोग ऑक्सीजन के लिये तड़प रहे थे, अस्पतालों में जगह पाने के लिये लाइन लगा कर खड़े थे तो आप क्या कर रहे थे? साहेब आप चुनावी रैलियों में जा-जाकर अपने लिये राजनीतिक ऑक्सीजन बटोर रहे थे। मगर साहेब क्या उस दौरान एक बार भी आपने सोचा की पूरे देश की जनता की जान की रक्षा करना आपकी जिम्मेदारी है। लोग जान गवां रहे थे और आप वोट हासिल करने में जुटे थे। साहेब, अगर आपको जीत मिली तो वो कितनी लाशों पर चढ़कर मिलेगी कभी आपने सोचा। इस जीत के पीछे कितने लोगों की आह साथ मिलेगी यह ख्याल किया आपने। आप चाहते तो सब रोक सकते थे मगर विजयी रथ को रोकना आपने उचित नहीं समझा और आज लोग आपके अश्वमेघ यज्ञ में अपने प्राणों का बलिदान दे रहे हैं।

सुन रहा है न तू रो रहे है हम

साहेब, एक दिन दुनिया छोड़़ कर जाना तो सभी को है लेकिन 21वीं सदी के भारत में कोई आदमी बिना इलाज के जिंदगी खो दे तो इससे शर्मनाक बात और क्या हो सकती है। साहेब, नैतिकता की बातें करने से क्या होगा जब शीर्ष अदालत ही आप पर सवाल उठा रही हो तो क्या आपकी नैतिकता कहती है कि आपको पद पर रहने का अधिकार है। नहीं साहेब, आपने कोरोेना की पहली लहर में जो किया वो वाकई काबिल-ए-तारीफ था मगर दूसरी लहर में आप नाकाम साबित हुए। और इसका बड़ा कारण था आपकी राजनीतिक महत्वकांक्षा जिसने अनगिनत जिंदगियां छीन लीं।

सुन रहा है न तू रो रहे है हम

साहेब, चुनाव खत्म होेने के बाद निःसंदेह आप एक्टिव मोड पर हैं और उम्मीद है कि आप हालात पर काबू पाने में सफल भी होंगे। मगर साहेब यही तेजी अगर आप एक महीनेे पहले दिखा देते तो कितनी जिंदगियों को बचाया जा सकता था। आज भी हम अपनेे देश के संसाधनों का अधिकतम उपयोग कर रहे हैं, यही काम हम कुछ समय पहले भी कर सकते थे। मगर साहेब आप तो चुनाव में व्यस्त थे और अपने साथ बाबा को भी ले गये। अब इतना बड़ा प्रदेश भी संक्रमण पर काबू पाने में नाकाम हो गया। साहेब, आपने एक बार भी सोचा की आप सिर्फ एक पार्टी के नेता नहीं हैं बल्कि देश की जनता की जिम्मेदारी आप पर है। उनके प्राणों की रक्षा करना आपका धर्म है और आपका कर्तव्य भी। काश आप सोच लेते तो आज हम काफी लोगों की जान बचा सकते थे।

सुन रहा है न तू रो रहे है हम

साहेब, अपनो को खोने के गम में हमको तो रातों को नींद नहीं आती। आंखों से अनवरत बहते आंसू, विलाप करता परिवार कैसे दिन काट रहा है इसका अहसास आपको नहीं होगा। मगर साहेब, क्या कभी आपको यह अहसास होगा कि आप अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहे। आपके पास संसाधन थे, उनका उपयोग करने की सार्थक सोच भी थी, देश की जनता आपके साथ खड़ी थी, आपकी हर बात को देवदूत का संदेश मानती थी, मगर आपने उस विश्वास को तोड़ दिया। आपके सिस्टम ने अनगिनत जिंदगियां छीन लीं, क्या आप इस गम को कभी दूर कर पायेंगे। नहीं साहेब, हो सकता है आप खिलाफत करने वालों की आवाज दबा दें, लोगों को जेल में डाल दें, अखबारों, वेबसाईटों को बैन कर दें लेकिन अन्र्तआत्मा की आवाज को कैसे दबायेंगे साहेब। हमारे रोने की आवाज को अपने कानों तक पहुंचने से कैसे रोक पायेंगे साहेेब। क्या इस बार हमारे मन की बात सुन पायेंगे आप…

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