Akhilesh Yadav: भाजपा के सियासी हथकंडों में उलझ गए अखिलेश

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Akhilesh Yadav: भाजपा के सियासी हथकंडों में उलझ गए अखिलेश

अमित बिश्‍नोई

1989 के बाद पहली बार किसी राजनीतिक दल ने लगातार दूसरी बार यूपी की सत्ता हासिल करने में सफलता प्राप्त की है. इस सफलता के लिए बीजेपी ने बेहतरीन रणनीति के साथ अपने शिद्दतपसन्द चेहरे का भी बड़ी चालाकी से इस्तेमाल किया। बुलडोज़र और आक्रामक हिंदुत्व की राजनीति ने अपना रंग दिखाया, विशेषकर संघ कार्यकर्ताओं ने बीजेपी की नय्या पार लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। तीन चरणों की वोटिंग के बाद संघ प्रमुख मोहन भागवत ने अपने वालंटियर्स को सक्रिय होने का फरमान जारी किया जिसके बाद बाकी चार चरणों के लिए बीजेपी से ज़्यादा मेहनत संघ के कार्यकर्ताओं ने की. वह गाँव गाँव और घर घर तक पहुंचे। लोगों को बीजेपी के लिए वोट देने के लिए तैयार किया, वह यह परसेप्शन गढ़ने में कामयाब रहे कि सारा मुसलमान सपा की ओर जा रहा है और नतीजा हमारे सामने है.

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उत्तर प्रदेश में भाजपा के अलावा किसी के पास अगर कार्यकर्ताओं की बड़ी संख्या किसी के पास है तो वह समाजवादी पार्टी है. मगर फर्क यह कि भाजपा के कार्यकर्त्ता वालंटियर की तरह काम करते हैं और सपा के कार्यकर्ता भीड़ की तरह और यह भीड़ दिशाहीन होती है जिसे निर्देशित करने वाला कोई नहीं है. अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) ज़मीन से ज़्यादा इंटरनेट की राजनीती पर ज़्यादा भरोसा करने लगे हैं. अगर हम पिछले पांच सालों की बात करें तो बतौर विपक्षी नेता अखिलेश यादव जनता से जुड़े मुद्दों से और उनके लिए संघर्ष करते नहीं देखा गया. चुनाव से चंद महीने पहले वह अपने ड्राइंग रूम से बाहर निकले और सोचा कि यूपी की राजनीति (UP politics) में क्रांति ला देंगे, मगर वह यह चमत्कार नहीं कर सके. अखिलेश को मालूम होना चाहिए कि उसका मुकाबला उस पार्टी से साल के 365 दिन और 24 घंटे राजनीति के मोड़ में रहती है, उसके कार्यकर्ता लगातार लोगों के संपर्क में रहते हैं और यही वजह कि भारी नाराज़गी के बावजूद जनता ने भाजपा का विकल्प तलाश नहीं किया।

बीजेपी की इस सफलता में ओबीसी और दलित समाज ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दलित समाज की बहुत बड़ी संख्या भाजपा के साथ खड़ी हो गयी जिसने जाट और मुसलमानों के लामबंद होने के बावजूद भाजपा को ज़्यादा नुक्सान नहीं होने दिया। इसी तरह प्रदेश के दूसरे हिस्सों में बीजेपी को दलितों का भरपूर साथ मिला, यहाँ तक कि यादव बेल्ट में भी भाजपा ने शानदार प्रदर्शन किया। इसके उलट समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) दलितों और ओबीसी समाज को अपनी तरफ लाने में बहुत हद तक नाकाम रही बावजूद इसके उसने इसी वोट बैंक को साधने के लिए कई जातिवादी पार्टियों से गठबंधन किया.

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अहम् बात यह है कि इसबार मायावती की उम्मीदों पर दलित समाज ने ही पानी फेरा और यह बात बसपा सुप्रीमो ने स्वीकार भी की कि जाटव को छोड़ शेष दलित सपा के डर से भाजपा में चले गए. वैसे भी मायावती पर अंदर ही अंदर भाजपा की मदद के आरोप लगते रहे और मायावती की निष्क्रियता ने इन अफवाहों को बल भी दिया और लोग उसे भाजपा की बी टीम कहने लगे. हालाँकि बसपा को इसका बहुत बड़ा खामियाज़ा भुगतना पड़ा.

भाजपा और सपा में बुनियादी फ़र्क़ यह नज़र आया कि भाजपा ने जनता को जो भी लाभ दिए उसकी ज़बरदस्त ब्रांडिंग की और लाभार्थियों के मन मस्तिष्क में यह बात बिठाने में पूरी तरह कामयाब रही कि यह सारे लाभ योगी जी और मोदी जी की वजह से आपको मिल रहे हैं और यही दोनों आपको यह लाभ आगे भी देते रहेंगे। भाजपा ने इन लाभार्थियों के सामने भाजपा से ज़्यादा योगी और मोदी को आगे रखा क्योंकि उन्हें मालूम था इन्हें भरोसा है तो योगी और मोदी पर, भाजपा पर शायद उतना नहीं। वहीँ समाजवादी पार्टी (Samajwadi Party) ने अपने संकल्प पत्र के अच्छे वादों को चुनावी सभाओं की भीड़ तक ही सीमित रखा, सपा ने यह कोशिश नहीं की कि वह गाँव गाँव जाकर कच्चे मकानों और झोपड़ियों में लोगों से मिलकर उन्हें यह समझा सके कि वह लोग सत्ता में आ रहे हैं और आने के बाद यह सारे लाभ आप लोगों को अखिलेश सरकार देने जा रही है. लोगों ने जो मिल रहा है उसपर ज़्यादा भरोसा किया न कि जो मिलने वाला है उसपर। अनुकूल माहौल के बावजूद दोनों पार्टियों की रणनीति का यह अंतर नतीजों में साफ़ नज़र आया.

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अब जबकि अखिलेश हार चुके हैं भले ही उनकी शक्ति तीन गुना बढ़ी है लेकिन हार तो हार होती है, पांच साल तो विपक्ष में ही बैठना है. बड़ा लम्बा समय होता है यह किसी भी उस राजनीतिक पार्टी के लिए जो सरकार बनाने का सपना देखती और उसका सपना टूट जाता है. अब देखना है कि अखिलेश अपनी इस बढ़ी हुई ताकत का सही इस्तेमाल 2024 में कैसे करते हैं. क्या वापस फिर ड्राइंग रूम में चले जायेंगे और ट्विटर ट्विटर खेलेंगे या फिर 2027 में वापसी के लिए 2024 को गंभीरता से लेंगे और सड़कों पर दिखेंगे।

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