By: Dheeraj Upadhyay
लखनऊ: यूपी विधानसभा चुनाव में अभी भी करीब 6 महीने बाक़ी हैं, लेकिन राज्य के सभी राजनीतिक दल यूपी चुनाव 2022 से पहले ब्राह्मण मतदाताओं को लुभाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं, चाहे वह बहुजन समाज पार्टी (बसपा) Bahujan Samaj Party (BSP) हो या समाजवादी पार्टी (सपा) Samajwadi Party (SP)। सपा प्रमुख अखिलेश यादव Akhilesh Yadav ने रविवार को लखनऊ में अपने शीर्ष ब्राह्मण नेताओं की एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई, जिसमें लगभग 13% ब्राह्मण मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने की रणनीति पर चर्चा की गई।
उत्तर प्रदेश की सभी पार्टियों को लगता है कि भाजपा के Yogi शासन में इस समुदाय का शोषण और उनकी उपेक्षा हुई है I सपा अध्यक्ष को विश्वास है कि अगर पार्टी बीजेपी (BJP) से नाराज ब्राह्मण मतदाताओं तक अपनी बात पहुंचाने में सफल रही तो ये समुदाय SP को वोट कर सकता है I
हालांकि, जनेश्वर मिश्रा (छोटे लोहिया) के निधन के बाद पार्टी के पास उनके कद का कोई भी ब्राह्मण नेता सपा कैडर में नहीं बचा है, लेकिन, फिर भी अखिलेश यादव अपने सलाहकारों के कहे अनुसार ब्राह्मण मतदाताओं को लुभाने के लिए हर संभव कोशिश कर रहे हैं। इसलिए उन्होंने अपने आवास पर ब्राह्मण नेताओं की बैठक बुलाई, जिसमें वरिष्ठ नेता माता प्रसाद पांडेय, पूर्व मंत्री अभिषेक मिश्रा और मनोज पांडे, पूर्व मंत्री पवन पांडेय और सनातन पांडेय ने भाग लिया I
वहीं दूसरी तरफ बसपा महासचिव सतीश चंद्र मिश्रा के तत्वावधान में बसपा द्वारा अयोध्या में “ब्राह्मण सम्मेलन” का आगाज किया गया, BSP की तरह अखिलेश यादव भी ‘प्रबुद्ध वर्ग’ यानि ब्राह्मण समुदाय को लुभाने में पीछे नहीं रहना चाहते हैं।
यूपी में ब्राह्मण वोटर (Brahmin voters in UP)
गौरतलब है कि बसपा 2007 में यूपी में सोशल इंजीनियरिंग (social engineering) के बल पर सत्ता में आई थी, जहां पार्टी ने 403 सीटों वाली विधानसभा में 30.43 फीसद वोट के साथ 206 सीटें जीती थी।
बता दें कि मिश्रा ने पहले ही अयोध्या में रामलला का आशीर्वाद लेते हुए कहा था कि अगर 13% ब्राह्मण वोट लगभग 23% दलित वोटों के साथ मिल जाते हैं तो यह उत्तर प्रदेश में भाजपा को हराने का अजेय आंकड़ा बन जाएगा।
2007 में बसपा ने प्रसिद्ध नारा दिया था “ब्राह्मण शंख बजायेगा हाथी बढ़ता जाएगा” जो काफी मशहूर हुआ था I
बसपा सुप्रीमो, मायावती Mayawati 2007 के उसी जादू को 2022 में दोहराने की कोशिश कर रही हैं, जहाँ पार्टी को ‘सोशल इंजीनियरिंग’ फॉर्मूले के दम पर पिछड़ी जाति के साथ सवर्ण वोट हासिल हुए थे।
हालांकि, यूपी में पिछले दो चुनावों में गठजोड़ के खराब स्वाद के बाद, अखिलेश यादव ने अकेले जाने का फैसला किया है या किसी भी बड़ी पार्टी के बजाय छोटी पार्टियों के साथ गठबंधन की बात कही है। उसी दिशा में आगे बढ़ते हुए अखिलेश ने 2022 में वापसी करने के लिए अपने विश्वसनीय मुस्लिम + यादव (MY) संयोजन के साथ निषाद और ब्राह्मण जैसे विशिष्ट समुदायों को साधने का फैसला किया है।
इसे सुनिश्चित करने के लिए समाजवादी पार्टी के ब्राह्मण नेता एक समिति बनाएंगे जो यह सुनिश्चित करने का काम करेगी कि समुदाय के मुद्दों का त्वरित समाधान किया जाए तथा SP उक्त समिति के नेतृत्व में प्रदेश में जिलेवार ‘ब्राह्मण सम्मेलन’ का आयोजन करेगी। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी पार्टी समुदाय के साथ मजबूती से खड़ी है।
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इस बीच, बीजेपी दोनों पार्टियों के इस ब्राह्मण मिलन कार्यक्रम से अप्रभावित दिख रही है, बीजेपी प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा, यूपी जाति आधारित राजनीति से आगे बढ़ गया है, लोग अब विकास चाहते हैं I हालांकि, राज्य के कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बसपा ब्राह्मण सम्मेलन, पर भाजपा की चुप्पी, सपा के वोट बैंक को सेंध लगाने और इसे बहुदलीय लड़ाई बनाने की कोशिश है, जिसका फायदा भाजपा को ही मिलेगा। बता दें कि 2014 के बाद से बीजेपी ने यूपी में लगभग 40% वोट शेयर बनाए रखा है, जो कि सपा और बसपा से काफी आगे है।
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