न्यूज डेस्क। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने आज यूपी विधानसभा चुनाव ना लड़ने का ऐलान करके सबको हैरत में डाल दिया है। अचानक की गई इस इस घोषणा के अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं। लेकिन गौर से देखा जाए तो यह अखिलेश यादव की रणनीति है जो भाजपा को टक्कर देने के लिए तैयार की गई है।
गौरतलब है कि चुनाव कोई भी हो भारतीय जनता पार्टी के स्टार प्रचारकों की टीम विपक्ष के प्रमुख नेताओं को चारों ओर से घेर कर आक्रमक रुख अपना लेती है। भाजपा के वरिष्ठ नेता विपक्षी दलों के नेताओं के क्षेत्र में जाकर लगातार प्रचार करते हैं। इसकी वजह से विपक्ष के प्रमुख नेता अपने क्षेत्र से बाहर जाकर प्रचार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। जिसका का खामियाजा जहां पार्टी को होता है वही कई बार प्रमुख नेताओं को भी हार का शिकार बनना पड़ता है। इसका ताजा उदाहरण पश्चिम बंगाल में हुए विधानसभा चुनाव में पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की हार से समझा जा सकता है। भाजपा ने ममता बनर्जी को हराने के लिए अपनी सारी शक्ति लगा दी थी जिसका नतीजा ममता बनर्जी की हार के रूप में सामने आया।
बात करें उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तो अभी तक के जो हालात हैं उसमें भाजपा को टक्कर देने की हिम्मत और ताकत सिर्फ समाजवादी पार्टी में ही दिखाई दे रही है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने फिर से सिर खड़ा किया है मगर वह भाजपा को सत्ता से बाहर करने के लिए नाकाफी है। ऐसे में अभी तक जो परिदृश्य सामने आया है उसको देखते हुए अखिलेश यादव के नेतृत्व में सपा अन्य विपक्षी दलों के मुकाबले प्रदेश में लीड करती हुई दिख रही है। अखिलेश यादव इस महत्वपूर्ण चुनाव में किसी भी प्रकार से भाजपा के चक्रव्यूह में फंसना नहीं चाहते। वह जानते हैं कि यदि वह चुनावी मैदान में उतरे तो भारतीय जनता पार्टी के स्टार प्रचारक उनको क्षेत्र से बाहर नहीं निकलने नहीं देंगे। ऐसे में उत्तर प्रदेश की 400 विधानसभा सीटों पर प्रचार करना अखिलेश यादव के लिए मुश्किल हो जाएगा। अगर उन्होंने ऐसा करने का जोखिम उठाया तो उनके सामने अपनी सीट पर हारने को खतरा अवश्य मंडरायेगा।
पूर्व में भी अखिलेश यादव ने विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा था लेकिन वह विधान परिषद से चुनकर विधायिका तक पहुंचेे और सीएम बने। उत्तर प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे भी विधानसभा चुनाव लड़ने की वजह विधान परिषद से चुनकर विधायिका में पहुंचे थे। बसपा प्रमुख मायावती ने भी विधानसभा चुनाव लड़ने की बजाए विधान परिषद के जरिए ही विधानसभा में पहुंचने का निर्णय लिया था। ऐसा करना किसी भी वरिष्ठ नेता या मुख्यमंत्री प्रत्याशी के लिए अधिक सुगम है। वह अपना समय अन्य विधानसभाओं में जाकर चुनाव प्रचार करने और पार्टी के लिये रणनीति बनाने में लगाते हैं।
यही सोच सपा प्रमुख अखिलेश यादव की भी रही होगी जिसके चलते उन्होंने चुनाव ना लड़ने का फैसला लिया है। दरअसल अखिलेश यादव के सामने सबसे बड़ी चुनौती इस समय मुस्लिम वोटरों को बिखरने से रोकना है। क्योंकि एमआईएम के असुउद्दीन ओवैसी लगातार प्रचार कर प्रदेश के मुस्लिम वोटरों को अपने पाले में खींचने का प्रयास कर रहे हैं। वही पुनर्गठित हो रही कांग्रेस भी मुस्लिम वोटरों को लुभा सकती है। समाजवादी पार्टी में ऐसा कोई मुस्लिम नेता नहीं है जो मुस्लिम वोटरों को रोकने में कामयाब रहे। यह काम सपा में अगर कोई कर सकता है तो वह अखिलेश यादव ही हैं जो मुस्लिमों में बेहद लोकप्रिय हैं। ऐसे में अखिलेश यादव के चुनाव में उतरने की कीमत सपा को मुस्लिम मतदाता खोकर चुकानी पड़ती। और यह कीमत उन्हें सत्ता सिंहासन से दूर, बहुत दूर कर देती।
हालांकि भाजपा और अन्य विपक्षी दल सपा के मुखिया के चुनाव मैदान में न उतरने के फैसले को उनकी कमजोरी या चुनाव से पहले ही हार को स्वीकार करना बताकर जनता को अपने पक्ष में लाने का प्रयास कर सकते हैं। मगर रणनीति के तौर पर देखें तो अखिलेश यादव का यह दांव उनको संपूर्ण चुनाव में ध्यान केंद्रित करने का समय देगा जोकि सत्ता में वापस आने के लिए बेहद जरूरी भी है।

