मेरठ। मई 1987 में हुआ मलियाना कांड जिससे पूरा देश हिल गया था। नरसंहार के पीड़ित पूरे 36 साल कोर्ट में लड़ाई लड़ते रहे। लेकिन इसके बाद भी सभी 41 आरोपी साक्ष्य के आभाव में बरी हो गए। मलियाना कांड के पीड़ितों के जख्म आज भी हरे हैं। मलियाना कांड की जांच के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त जस्टिस जीएल श्रीवास्तव की अध्यक्षता में गठित जांच आयोग की रिपोर्ट भी ठंडे बस्ते में चली गई है। आयोग की सिफारिशों पर कोई कार्रवाई होना तो दूर रिपोर्ट तक सार्वजनिक नहीं की गई। आयोग ने दंगे में पीएसी की भूमिका पर सवाल उठाए थे।
कांग्रेस सरकार ने की थी न्यायिक जांच की घोषणा
मलियाना नरसंहार की जांच के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने 27 मई 1987 को न्यायिक जांच की घोषणा की थी। 27 अगस्त को जस्टिस जीएल श्रीवास्तव को जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। उन्होंने 31 जुलाई 1989 को सरकार को जांच रिपोर्ट सौंप दी थी। यह रिपोर्ट ठंडे बस्ते में चली गई। रिपोर्ट कभी सार्वजनिक नहीं की गई। बताया जाता है कि पूरी रिपोर्ट में पुलिस और पीएसी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए गए थे।
आरोपी पक्ष के अधिवक्ता छोटे लाल बंसल का कहना हैं कि पुलिस ने एफआईआर दर्ज कराने में खेल किया था। लोगों को झूठे आरोपी बनाया था। जिन 93 लोगों के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी। उनमें से दो की मौत दंगे से सात साल पहले तो दो की मौत 10 साल पहले हो चुकी थी। पूरी एफआईआर तत्कालीन थानेदार ने अपने हिसाब से लिखाई थी। उसने मतदाता सूची ली और उसमें से 50 परिवारों के लोगों के नाम लिखा दिए, यह भी नहीं देखा कि जिनके नाम हैं, वह जिंदा भी हैं या नहीं।
वादियों को भी नहीं पता कि किसके नाम लिखे गए
जो वादी बनाए गए, उन तक को नहीं पता था कि किसके नाम लिखे गए हैं। एफआईआर उनसे एसओ ने अपने हिसाब से लिखवाई थी। कोर्ट में केस के न टिकने की यह बड़ी वजह रही। उन्होंने बताया कि इसके अलावा जो गवाह पेश किए गए। उनमें से छह लोगों ने यह गवाही दी कि नामजद किए गए लोग गोली चलाने वाले नहीं है। बल्कि गोली तो तत्कालीन प्रशासन के कहने पर पीएसी और पुलिसवालों ने चलाई थी, जिनसे लोगों की मौत हुई। जांच आयोग ने इन सब मामलों को संज्ञान में लिया था। मलियाना दंगे में 63 लोगों की मौत हो गई थी।
हाईकोर्ट में दाखिल की गई थी पीआईएल
उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व महानिदेशक विभूति नारायण राय और पीड़ित इस्माइल द्वारा इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच के समक्ष जनहित याचिका पीआईएल दायर की गई थी। इस्माइल ने अपने परिवार के 11 सदस्यों को मलियाना में खो दिया था। मेरठ ट्रायल कोर्ट में मामले की पैरवी करने वाले एक वकील एमए राशिद ने एसआईटी द्वारा निष्पक्ष और त्वरित सुनवाई और पीड़ितों के परिवारों को पर्याप्त मुआवजा देने की मांग की थी।
पुलिस पीएसी पर डराने-धमकाने का आरोप
याचिकाकर्ताओं ने यूपी पुलिस और पीएसी कर्मियों पर पीड़ितों और गवाहों को गवाही नहीं देने के लिए डराने.धमकाने का भी आरोप लगाया था। जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट के कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने 19 अप्रैल 2021 को उत्तर प्रदेश सरकार को जवाबी हलफनामा दाखिल करने का आदेश दिया था। पीठ ने कहा था, हम उत्तर प्रदेश सरकार से इस रिट याचिका पर जवाबी हलफनामा और पैरा.वार जवाब दाखिल करने का आह्वान करते हैं। याचिकाकर्ताओं के लिए मानवाधिकार कार्यकर्ता और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील कॉलिन गोंजाल्विस मामले में पेश हुए थे।
