अहमदाबाद। गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल भले ही आज इस दुनिया में नहीं हैं। लेकिन गुजरात में उन्होंने भाजपा के लिए जो किया उनके योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता। उनको अगर गुजरात के लिए भाजपा का अटल बिहारी वाजपेयी कहा जाए तो इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। गुजरात से कांग्रेस को उखाड़कर फेकने वाले दिग्गज नेता केशुभाई पटेल भाजपा की सियासत के दिग्गज मजे हुए नेता थे। वो दो बार राज्य के मुख्यमंत्री रहे।
1995 में भाजपा ने केशु को उतार कर दिया कांग्रेस का सफाया —
भाजपा की सियासी जमीन गुजरात में तैयार करने में केशुभाई पटेल की भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही है। 90 के दशक में 1995 में राम मंदिर आंदोलन के बाद गुजरात विधानसभा चुनाव में भाजपा ने केशुभाई पटेल को मैदान में उतरकर कांग्रेस का सफाया कर दिया था। यहीे वो दौर था जब गुजरात में पटेल बिरादरी राजनीति में भाजपा के करीब आई और ऐसी आई कि फिर वापस नहीं लौटी। जिसके बूते भाजपा आज तक कगुजरात में राज कर रही है। केशुभाई पटेल ने राजनीतिक सफ़र की शुरुआत जीरो से की थी। वे राजनीतिक जीवन में बड़े उतार-चढ़ाव देख चुके थे। जनसंघ की स्थापना 1960 में हुई और यही वो दौर था जब केशुभाई पटेल ने अपनी राजनीतिक की शुरुआत की। इस दौर में केशुभाई पटेल संघ,जनसंघ और भाजपा के दिग्गज नेता शंकर सिंह वाघेला को मजबूत करने के लिए गांव-गांव भटकते थे। इसी के दम पर उन्होंने गुजरात के सियासी गलियारे में अपनी पैठ बनाई।
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182 में से 121 सीटों पर खिला दिया था कमल —
1977 में केशुभाई पटेल राजकोट लोकसभा सीट से चुनाव जीते। हालांकि बाद में उन्होंने इस सीट से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद बाबूभाई पटेल की जनता मोर्चा सरकार में 1978 से 1980 तक कृषि मंत्री बने रहे। गुजरात में जिस नेता के दम पर कांग्रेस का एकछत्र सम्राज्य था उनका नाम था चिमन भाई पटेल। चिमन भाई पटेल की मृत्यु के बाद केशुभाई पटेल बिरादरी का चेहरा बनकर उभरे। केशुभाई पटेल के नेतृत्व में भाजपा ने 1995 के चुनाव में गुजरात की 182 में से 121 सीटों पर कमल खिला दिया। जबकि कांग्रेस 45 के आंकड़े पर ही सिमट गई। यहां तक कि मुस्लिम बहुल इलाकों में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा।
वाघेला और केशुभाई में टकराव और नरेंद्र मोदी की गुजरात राजनीति में एंट्री —
सत्ता मिलने के बाद केशुभाई पटेल ने कुशल राजनेता की तरह अपना एकछत्र राज कायम किया। केशुभाई ने अपने मंत्रिमंडल में ऐसे किसी विधायक को जगह नहीं दी जो शंकर सिंह वाघेला के करीबी थे। नरेंद्र मोदी भी इसी समय भाजपा केंद्रीय संगठन में अपनी एंट्री मार चुके थे। सियासत ने ऐसे करवट पलटी कि केशुभाई को छह महीने के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ी। शंकर सिंह बघेला 47 विधायकों के साथ मध्य प्रदेश आ गए। ऐसे में भाजपा शीर्ष नेतृत्व ने उन्हें साधने की कवायद की। जिसके तहत केशुभाई पटेल की विदाई हो गई। इसके बाद सुरेश मेहता मुख्यमंत्री बने। केशुभाई पटेल की बतौर मुख्यमंत्री पहली पारी की असफलता थी। शंकर सिंह बघेला अपनी पार्टी बनाकर मुख्यमंत्री तो बने लेकिन वो अधिक दिनों तक सत्ता पर नहीं टिक पाए। साल 1998 में विधानसभा चुनाव हुए। केशुभाई पटेल के सामने कोई चुनौती नहीं रही। ऐसे में केशुभाई पटेल ने भाजपा को जीत दिलाने के लिए पूरी ताकत झोंक दी। भाजपा ने चुनाव में 182 में से 117 सीटों पर जीत दर्ज की। वहीं कांग्रेस 60 पर सिमट गई। चार मार्च 1998 को केशुभाई ने गुजरात के दूसरी बार मुख्यमंत्री बने। लेकिन दो उपचुनाव में भाजपा को हार मिलने और कांग्रेस की जीत पर हाईकमान ने केशुभाई पटेल को मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा सौंपने के लिए कहा। छह अक्टूबर को केशुभाई पटेल ने मुख्यमंत्री की कुर्सी तयाग दी। उसके बाद उनकी जगह नरेंद्र मोदी की गुजरात सीएम के रूप में एंट्री हुई। नरेंद्र मोदी ने सत्ता पर काबिज होने के बाद ऐसे मजबूती से अपने पैर जमाए कि उन्हें आज तक कोई उखाड़ नहीं सका। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा को गुजरात में जबरदस्त जीत मिलती चली गई।
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