Naushad Death Anniversary Special: लखनऊ में जन्में, मुम्बई में हुए ‘नौशाद’

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बॉलिवुड म्यूजिक इंडस्ट्री के शीर्षस्थ नौशाद साहब लखनऊ की पहचान रहे और लखनऊ भी उनकी पहचान बन गया। लेकिन इसी लखनऊ से धीरे धीरे उनकी यादें कहीं गुम सी हो रही हैं इसका एहसास शायद किसी को नहीं हो रहा है। अमीनाबाद की वह संकरी गलियां जहां उनका बचपन गुजरा, वहां पुराने रहने वाले तो उनके घर की तरफ इशारा करते हैं, लेकिन नई पीढ़ी को यह कहने में देर नहीं लगती कि कौन नौशाद? यह इस शहर का ऐसा दुखद पहलू है जिसने कई हस्तियों की कब्र के निशा तक मिटा दिये हैं। आज महान संगीतकार नौशाद की पुण्य तिथि है। पुराने लखनऊ के खंदारी बाजार में जन्मे और पहले फिल्मफेयर विजेता संगीतकार नौशाद ने अपने पूरे जीवन में एक से एक हिट गीत दिए। लगभग 70 फिल्मों में अपने कर्णप्रिय संगीत से दुनिया को दीवाना बनाने वाले नौशाद 5 मई 2006 को वह दुनिया से रुखसत कर गए थे।

आज भी है वह दुकान

अगर शहर में उनकी किसी यादगार निशानी की बात करें तो नौशाद संगीत अकादमी ही नजर आती है। लेकिन इसे भी लोगों ने अपनी कमाई का जरिया बना लिया है। नौशाद साहब के भतीजे बताते हैं कि नौशाद साहब ने अपनी जिन्दगी में ही यह कहा था कि जब यहां संगीत नहीं तो मेरा नाम क्यों लिखा है इसे हटा दिया जाय। मीनाबाद में नब्बे साल से ज्यादा पुरानी अल्लन साहब की दुकान आज भी उन यादों को समेटे है जो जहां नौशाद साहब ने अपने मामू से हारमोनियम बनाना और बजाना सीखा। चाहे उनकी यादगार तस्वीरें हों या वह खत जिनमें उन्होंने लखनऊ को शिद्दत से याद किया था। पतंग उड़ाने पर पड़ने वाली नानी की डांट के साथ उन्होंने अपने ननिहाल को कितनी ही दुआएं दे लिख भेजी थीं। नौशाद के बारे में कहा जाता है कि उन्हें बचपन से ही संगीत का शौक था। और उनके मामू की वाद्य यंत्रों की दुकान से उनका शौक परवान चढ़ा। यहीं से उन्हे वाद्य यंत्रों को बजाने की ललक पैदा हुई। वह बचपन से ही संगीत की बारीकियों को समझने लगे थे। शुरुआती दिनों में उन्हें उस्ताद मुश्ताक हुसैन खां, और उस्ताद झण्डे खां जैसे संगीत के बारीक जानकारों की संगति मिल गयी। लखनऊ की इस अजीम शख्सियत को गुजरे अभी उतना अरसा भी नहीं हुआ है कि शहर उन्हें इस तरह भुला दे जैसे सदियां गुजर गईं।

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मुगल-ए-आजम ने मचा दी थी धूम

नौशाद की फिल्मों में अंदाज, आन, मदर इंडिया, अनमोल घड़ी, बैजू बावरा, अमर, स्टेशन मास्टर, शारदा, कोहिनूर, उड़न खटोला, दीवाना, दिल्लगी, दर्द, दास्तान, शबाब, बाबुल, मुग़ल-ए-आज़म, दुलारी, शाहजहां, लीडर, संघर्ष, मेरे महबूब, साज और आवाज, दिल दिया दर्द लिया, राम और श्याम, गंगा जमुना, आदमी, गंवार, साथी, तांगेवाला, पालकी, आईना, धर्म कांटा, पाकीजा, सन आफ इंडिया, लव एंड गाड सहित अन्य कई फिल्मों में उन्होंने अपने संगीत से लोगों को झूमने पर मजबूर किया। पद्मभूषण और दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित संगीतकार नौशाद अली कई फिल्मों में संगीत दिया पर मुगल-ए-आजम के गानों ने उस दौर में तहलका मचा दिया। नौशाद की गायक मो रफी से गजब की जुगलबंदी थी। मुगल-ए-आजम फिल्म में वह गुलाम अली साहब की आवाज चाहते थे लेकिन उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि वह फिल्मों के लिए गाना नहीं गाते हैं। उस समय में गुलाम अली साहब को गाने के लिए 25000 रुपए दिए गए थे। उस समय मो रफी और लता मंगेश्कर जैसे गायकों को 300-400 रुपए दिए जाते थे।

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