‘ढोंढू जस्ट चिल’: मेरी जिंदगी का फलसफा भी यही है – बंटी राठौर

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‘ढोंढू जस्ट चिल’: मेरी जिंदगी का फलसफा भी यही है – बंटी राठौर

ज़ेबा हसन

कहते हैं होता वही है जो तकदीर में लिखा होता है। सोचने से कुछ नहीं होता। बंटी राठौर की किस्मत में भी कुछ और ही लिखा था। बॉलीवुड की कई हिट फिल्मों में, सुपरहिट डायलॉग लिखने वाले बंटी मेरठ से मुम्बई गए थे कोरियोग्राफर बनने लेकिन आज फिल्मी दुनिया में बतौर डायलॉग राइटर उनकी अपनी अगल पहचान है। धमाल सीरीज से लेकर गोलमाल 3, खिलाड़ी 786 और यमला पगला जैसी कई हिट फिल्में उनके करियर में शामिल हैं।

‘ढोंढू जस्ट चिल’

‘ढोंढू जस्ट चिल’: मेरी जिंदगी का फलसफा भी यही है – बंटी राठौर

संजय मिश्रा के किरदार ढोंढू, के लिए लिखी गई पंच लाइन ‘ढोंढू जस्ट चिल’ तो आज भी लोगों की जुबान पर रहती है। लॉकडाउन के चलते इस वक्त शूटिंग तो बंद हैं लेकिन बंटी इन दिनों भी लेखन में व्यस्त हैं। बंटी के फिल्मी सफर को लेकर हमने उनसे की यह खास बातचीत।

डेढ़ लाख रुपया नहीं था मेरे पास

‘ढोंढू जस्ट चिल’: मेरी जिंदगी का फलसफा भी यही है – बंटी राठौर

मैं डांस किया करता था और सोचता था इसी में भविष्य बनाना है। एक दिन कोरियोग्राफर बनने के इरादे से मुम्बई भी पहुंच गया। जब वहां पहुंचा तो पता चला कोरियोग्राफर बनने के लिए एक कार्ड बनता है और इसे बनवाने के लिए डेढ़ से दो लाख रुपए की जरूरत होती है। मेरे पास इतना पैसा होता तो मैं मेरठ से मुम्बई आता ही क्यों। खैर वो इरादा तो पूरा नहीं हो पाया लेकिन कुछ दोस्तों के साथ मुलाकात हुई। उन्हीं में रेस 1 के राइटर थे जिन्होंने मुझे कुछ लिखने के लिए कहा। दोस्ती यारी में मैं कुछ कुछ लाइने लिखने लगा। मेरे लिखे पंचेज सबको पसंद आते। फिर मुझे कुछ पैसे भी मिलने लगे। एक लाइने कब एक सीन में बदल गई, एक सीन से कब ऐपिसोड लिखना शुरू हुआ और कब ऐपिसोड से फिल्मों का सफर शुरू हो गया पता ही नहीं चला।

मजा आता है, इसलिए मुश्किल नहीं

‘ढोंढू जस्ट चिल’: मेरी जिंदगी का फलसफा भी यही है – बंटी राठौर

हाजिर जवाबी, सेंस ऑफ ह्यूमर तो बचपन से ही था। उसके बाद मैंने हिंदी साहित्य बहुत पढ़ा था। कहीं न कहीं यही वजह मेरी लेखनी के पीछे है। मुझसे कई बार लोग सवाल करते हैं कि कॉमेडी जॉनर में लिखना कितना मुश्किल होता है। लेकिन मैं इसे मुश्किल नहीं मानता हूं क्योंकि मुझे कॉमेडी लिखने में मजा आता है। जिस काम में मजा आए वह मुश्किल नहीं होता फिर वह चाहे कोई भी काम हो। मेरे करियर में ज्यादातर कॉमेडी फिल्में ही हैं यही वजह है कि मेरी इमेज भी कॉमेडी राइटर के तौर पर बन गई है। मैं अपनी इस इमेज से खुश भी हूं क्योंकि मुझे कॉमेडी जॉनर में मजा आता है। हां मैं थ्रिलर लिखना भी पसंद करता हूं और निर्देशक कुणाल कोहली के साथ उनकी एक थ्रिलर फिल्म के लिए भी लिखा है। इसके साथ कपिल शर्मा की वेब सीरीज और एक टीवी शो के लिए भी लिख रहा हूं।

आज भी फेवरिट है धमाल

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2001 में मैं मुम्बई आया था और 7 सितंबर 2007 में मेरी पहली फिल्म धमाल रिलीज हुई थी। इस तारीख को मैं कभी नहीं भूल सकता हूं। यह फिल्म आज भी मेरी फेवरिट फिल्म है। और 2010 में ऑल दा बेस्ट रिलीज़ हुई इसकी एक पंच लाइन जस्ट चिल्ल ढोंढू जो मेरे दिल के बहुत ही करीब है। अपनी जिंदगी में भी मैं इसी फलसफे पर चलता हूं। जिंदगी में कोई टेंशन लेने का नहीं, गुस्सा करने का नहीं, बस जस्ट चिल्ल। इस लाइन को लिखते वक्त पहले तो जस्ट चिल्ल पर सब सहमत थे लेकिन मैंने उस किरदार का नाम भी जोड़ दिया ढोंढू। और ढोंढू बहुत हिट हुआ।

हमेशा शांत नज़र आते हैं अक्षय

‘ढोंढू जस्ट चिल’: मेरी जिंदगी का फलसफा भी यही है – बंटी राठौर

इतने वक्त में मैंने बहुत लोगों के साथ काम किया है और इनमे अक्षय कुमार के लिए मैं कह सकता हूं कि वह बहुत ही शांत स्भाव के इंसान है। उनके साथ जब मैं खिलाड़ी 786 कर रहा था, करीब दो साल काम चला। मैंने अक्षय कुमार को कभी गुस्सा करते देखा ही नहीं। वह हमेशा शांत नजर आते थे। एक दिन मैंने उनसे पूछ भी लिया था कि आपको गुस्सा नहीं आता है कभी।

अब तो बीवी के इशारों पर नाचता हूं

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हिट फिल्म का सीकवेल पर काम करने में प्रेशर तो होता ही है। उस वक्त दिमाग में यही चलता है कि पहली फिल्म से ऊपर ना सही लेकिन नीचे तो नहीं जाना है। जहां तक सवाल डांस को मिस करने का है तो अपनों की शादी-ब्याह में वह शौक भी पूरा कर लेता हूं। इसके अलावा अब तो बीवी के इशारों पर हर वक्त नाचता ही रहता हूं। (हंसते हुए)

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