देश में व्रत त्योहारों का अपना अलग महत्व है। इन्हीं में से एक है सावन माह की विश्व प्रसिद्ध कांवड़ यात्रा। कांवड़ यात्रा भगवान शिव के भक्तों द्वारा किया जाने वाला एक पवित्र अनुष्ठान है। कांवड़ की यह यात्रा पूरे देश में सावन महीने में मनाई जाती है। जो इस शुभ यात्रा में भाग लेते हैं, उन्हें कांवड़िया कहते हैं। इस महीने लोग भगवान शिव की पूजा अराधना करते हैं। शिवभक्त विभिन्न स्थानों से गंगा जल लेकर फिर त्रयोदशी तिथि पर कांवड़ियों द्वारा गंगा जल को अपने गृहनगरों में शिवलिंग पर गंगा जल चढ़ाते हैं। इस वर्ष कांवड़ यात्रा की शुरुआत 14 जुलाई को हो चुकी थी और अब कल यानी शिवरात्रि के दिन समाप्त होगी। हिंदू शास्त्रों के अनुसार विश्व के पहले कांवड़िया के रूप में श्रवण कुमार को जाना जाता है। जिन्होंने अपने मॉता पिता को कांवड़ में बिठाकर तीर्थ यात्रा कराई थी। उसके बाद हरिद्वार से गंगाजल उन्हीं के साथ लाकर शिव पर अर्पित कराया था। इसके बाद दूसरे कांवड़ियां के रूप में भगवान परशुराम को जाना जाता है। जो भगवान शिव के अनन्य भक्तों में से एक माने जाते हैं। उन्होंने पहली बार कांवड़ यात्रा को सावन के महीने में शुरू किया था। उसके बाद से कांवड़ यात्रा संतों द्वारा की जाती रही थी। लेकिन 19 वे दशक में ये कांवड़ यात्रा आम लोगों द्वारा शुरू की गई। कांवड़ यात्रा मुख्य रूप से सावन मास के दौरान होती है। देश के अन्य हिस्सों में इसको ‘श्रवण मेला’ भी कहा जाता है। इस कांवड़ यात्रा में पुरुष ही नहीं बल्कि महिलाएं भी भाग लेती हैं।
कांवड़ यात्रा एक पवित्र और कठिन यात्रा है जो पूरे देश में शिवभक्तों द्वारा विशेष रूप पवित्र स्थानों से गंगा जल लाने के लिए रवाना होते हैं। कांवड़ यात्री गंगोत्री,गौमुख,ऋषिकेश और हरिद्वार से भी गंगाजल लेकर पैदल ही अपने गंतव्य की ओर बढ़ते हैं। कांवड़ यात्रा की रस्म का बहुत महत्व है। पूजा के इस रूप का अभ्यास करने के बाद कांवड़िया आध्यात्मिक विराम लेते हैं और पूरी यात्रा के दौरान शिव मंत्र और भजनों का जाप भी करते हैं। माना जाता है कि कांवड़ यात्रा को पूरा करने से कांवड़ियों को भगवान शिव से दिव्य आशीर्वाद मिलता है।

