आगामी तीन सितम्बर, शनिवार को श्रीराधा अष्टमी पर्व मनाया जाएगा। जन्माष्टमी के 15 दिन बाद ब्रज के रावल गांव में राधा जी का जन्म हुआ था। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधाष्टमी व्रत रखते हैं। पुराणों में राधा और रुक्मिणी को एक माना जाता है। जो लोग राधा अष्टमी के दिन राधा की उपासना करते हैं। उनके घर धन संपदा से सदा भरा रहता है। स्कंद पुराण के मुताबिक राधा श्रीकृष्ण की आत्मा हैं। इसी कारण भक्तजन सीधाी भाषा में उन्हें राधारमण भी कहते हैं। पद्म पुराण में परमानंद रस को राधा-कृष्ण का युगल-स्वरूप बताया है। इनकी आराधना के बिना जीव परमानंद का अनुभव ही नहीं कर सकता।
भविष्य पुराण और गर्ग संहिता में बताया है कि जब द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण पृथ्वी पर अवतरित हुए, तब भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी के दिन महाराज वृषभानु की पत्नी कीर्ति के यहां राधा अवतरित हुई। तब से भाद्रपद शुक्ल अष्टमी राधाष्टमी नाम से विख्यात हुई। जिन लोगों के घर में आर्थिक परेशानी रहती है उनके लिए भाद्र शुक्ल अष्टमी (03 सितम्बर, शनिवार) के दिन से लेकर आश्विन कृष्ण अष्टमी यानी 17 सितम्बर, शनिवार तक महालक्ष्मी माता का पूजन विधान से करने से करना शुभ होगा। ग्रंथांे में बताया है कि इस सरल विधान के अनुसार 03 सितम्बर से 17 सितम्बर तक नित्य प्रातः लक्ष्मी माता का ध्यान करते हुए ॐ लक्ष्मयै नमः, ॐ लक्ष्मयै नमः ॐ लक्ष्मयै नमः मंत्र का 16 बार प्रति दिन जप करें और फिर लक्ष्मीमाता का पूजन करते हुए श्लोक पाठ करें। इससे समय, शक्ति खर्च नहीं होगी उल्टा पुण्य बढ़ेगा श्लोक इस प्रकार है।
धनं धान्यं धराम हरम्यम, कीर्तिम आयुर्यश, श्रीयं,
दुर्गां दंतीन, पुत्रां, महालक्ष्मी प्रयच्छ मे,
ॐ श्री महालक्ष्मये नमः ॐ श्री महालक्ष्मये नमः

