- यौन शोषण पर बाॅॅम्बे हाईकोर्ट का फैसला पलटा
नई दिल्ली। ‘टच’ के अर्थ को ‘स्किन-टु-स्किन काॅन्टैक्ट बगैर यौन शोषण नहीं’ तक सीमित करने से बच्चों को यौन उत्पीड़न से बचाने के लिए लागू किये गये पाॅक्सो कानून की बेहद संकीर्ण और बेहूदा व्याख्या निकलकर आएगी। सुप्रीम कोर्ट ने आज यौन उत्पीड़न के मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि ऐसा किये जाने से पाॅक्सो कानून का उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा।
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दरअसल दिसंबर 2016 में नागपुर में सतीश नामक एक 38 साल के आरोपी 12 साल की किशोरी को बहला कर अपने घर ले गया और उसके ब्रेस्ट को छूने और निर्वस्त्र करने की कोशिश की थी। मामले में फैसला सुनाते हुए सेशन कोर्ट ने पाॅक्सो एक्ट के तहत तीन साल और धारा 354 के तहत एक साल की सजा सुनाई थी।
यह मामला बाॅॅॅम्बे हाईकोर्ट में गया तो नागपुर बेंच की जस्टिस पुष्पा गनेडीवाला ने 12 जनवरी को दिये अपने आदेश में कहा था कि 12 साल की बच्ची से यौन शौषण होने के ऐसे सबूत नहीं मिले हैं, जिससे साबित हो सके कि उसका टाॅप उतारा गया या फिर फिजिकल काॅन्टैक्ट हुआ। पाॅक्सो एक्ट का हवाला देते हुए कोर्ट ने इसे यौन अपराधों की श्रेणी में रखने लायक नहीं बताया। जस्टिस गनेडीवाला ने दोषी को पाॅक्सो एक्ट के तहत दी गई सजा से बरी कर दिया था। हालांकि आरोपी की आईपीसी की धारा 354 के तहत सुनाई गई एक साल की कैद को कोर्ट ने बरकरार रखा था।
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इस मामले में आज सुप्रीम कोर्ट ने बाॅॅॅम्बे हाईकोर्ट के फैसले को खारिज कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस यूयू ललित, एस रविंद्र भट और बेला त्रिवेदी की बेंच ने कहा कि पहने हुए या किसी अन्य कपड़े के ऊपर से बच्चे को गलत नीयत से छूना पाॅक्सो एक्ट में ही शामिल है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत को सीधे और सरल शब्दों का गूढ अर्थ निकालने का प्रयास नहीं करना चाहिये। ऐसी व्याख्याओं से पाॅक्सो कानून बनाने का उद्देश्य विफल हो जायेगा जिसकी इजाजत हम नहीं दे सकते। गौरतलब है कि बीती 27 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए आरोपी को बरी करने वाले बाॅम्बे हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी थी।

