यूपी के बिजली उपभोक्ताओं को जून में लगेगा करंट, 10% तक बढ़ेगा बिल का भार

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मार्च की महंगी बिजली खरीद की कीमत अब चुकाएंगे उपभोक्ता, फ्यूल सरचार्ज लागू
उपभोक्ता परिषद ने उठाए सवाल, कहा- पहले से सरप्लस होने पर अतिरिक्त वसूली क्यों?

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में बिजली उपभोक्ताओं को जून माह में बढ़े हुए बिल का सामना करना पड़ेगा। उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (यूपीपीसीएल) ने मार्च 2026 में बिजली खरीद और ट्रांसमिशन पर हुए अतिरिक्त खर्च की भरपाई के लिए फ्यूल सरचार्ज लागू करने का निर्णय लिया है। इसके तहत जून में जारी होने वाले बिजली बिलों में करीब 10 प्रतिशत तक अतिरिक्त राशि जोड़ी जाएगी।

बिजली क्षेत्र में लागू नई व्यवस्था के अनुसार ईंधन एवं बिजली खरीद समायोजन अधिभार (एफपीपीए) हर महीने वास्तविक लागत के आधार पर तय किया जाता है। मार्च में बिजली खरीद अपेक्षा से अधिक महंगी पड़ने के कारण उसकी लागत अब उपभोक्ताओं से वसूली जाएगी। पावर कॉरपोरेशन के आदेश में बताया गया है कि गणना के अनुसार सरचार्ज की दर 20.61 प्रतिशत बनती है, लेकिन फिलहाल उपभोक्ताओं पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त भार ही डाला जाएगा।

इस फैसले के बाद बिजली खरीद प्रक्रिया को लेकर बहस तेज हो गई है। राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने सरचार्ज बढ़ाने के निर्णय पर कड़ी आपत्ति जताई है और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। परिषद का कहना है कि उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डालने से पहले यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि बिजली खरीद लागत में इतनी बड़ी बढ़ोतरी क्यों हुई।

परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा ने आरोप लगाया कि नियामक आयोग द्वारा स्वीकृत बिजली खरीद लागत 4.94 रुपये प्रति यूनिट थी, जबकि मार्च 2026 में पावर कॉरपोरेशन ने करीब 5.86 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली खरीद दिखाई है। उनके अनुसार इस अंतर के कारण उपभोक्ताओं पर लगभग 1610 करोड़ रुपये का अतिरिक्त भार डाला जा रहा है।

उन्होंने मुख्यमंत्री से मांग की है कि यह जांच कराई जाए कि मार्च के दौरान महंगी बिजली किन परिस्थितियों में खरीदी गई और किन निजी बिजली उत्पादक कंपनियों से खरीद की गई। परिषद का यह भी दावा है कि बिजली कंपनियों के पास उपभोक्ताओं का करीब 51 हजार करोड़ रुपये का अधिशेष पहले से मौजूद है। ऐसे में अतिरिक्त सरचार्ज लगाना उपभोक्ता हितों के विपरीत है।

जून के बढ़े हुए बिजली बिलों को लेकर अब उपभोक्ताओं और बिजली विभाग के बीच बहस तेज होने की संभावना है। जांच और पारदर्शिता की मांग के बीच यह मुद्दा आने वाले दिनों में राजनीतिक और प्रशासनिक स्तर पर भी चर्चा का विषय बन सकता है।

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