न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए

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जाने माने शायर बशीर बद्र का शुक्रवार को 91 की उम्र में निधन, भोपाल में ली अंतिम सांस

डॉ बशीर बद्र शायरी की दूनिया का वह जादूगर जिसने अपनी कलम से आम जिंदगियों के जेहन में दस्तक दी थी। कभी राजनीति के मंच पर तो कभी दो प्यार करने वालों के दरमियां। कभी दो मुल्कों की तल्खियों पर तो कभी दोस्तों के बीच होने वाले मनमुटाव पर या फिर लोगों के दिलों में पनप रही नफरतों के बारे में। उनके अशआर-गजले हर मौजू पर लोगों की जुबान पर आ ही जाते थे। यही वजह है कि शुक्रवार को 91 की उम्र में जब उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कहा तो हर खास-ओ -आम ने उन्हें अपने अंदाज में याद किया। आइए जानते हैं उर्दू के मशहूर शायर बशीर बद्र के जाने के बाद उनके चाहने वाले और शायरी की दुनिया से ताल्लुक रखने वाले लोग उन्हें कैसे याद कर रहे हैं।

डॉ॰ बशीर बद्र का जन्म 12 फरवरी 1935 को यूपी के अम्बेडकर नगर के एक गांव में हुआ था। इनका पूरा नाम सैयद मोहम्मद बशीर है। साहित्य और नाटक आकेदमी में किए गये योगदानों के लिए उन्हें 1999 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था। अपने लंबे साहित्यिक जीवन में उन्हें पद्मश्री, साहित्य अकादमी पुरस्कार समेत कई सम्मान मिले। उन्हें उत्तर प्रदेश उर्दू अकादमी और बिहार उर्दू अकादमी ने भी सम्मानित किया था।साल 1980 में न्यूयॉर्क में उन्हें ‘पोएट ऑफ़ द ईयर’ चुना गया था।बशीर बद्र के नाम 18 हजार से अधिक अशआर दर्ज बताए जाते हैं।

उन पर पीएचडी करने वाले डॉ. अंजुम बाराबंकवी कहते हैं कि बशीर बद्र उन शायरों में थे जिन्होंने नई उर्दू ग़ज़ल को नई दिशा दी। उन्होंने बीबीसी से कहा, “उन्होंने समाज के दर्द को अपनी शायरी में जगह दी. भारत और पाकिस्तान के लगभग सभी बड़े गायकों ने उनकी ग़ज़लें गाईं।” डॉ. अंजुम बाराबंकवी के मुताबिक़, “बशीर बद्र की लोकप्रियता सिर्फ साहित्यिक दुनिया तक सीमित नहीं थी।एक चुनाव प्रचार के दौरानबशीर साहब का एक शेर बहुत इस्तेमाल हुआ था। वह शेर था-
लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में,
तुम तरस नहीं खाते बस्तियां जलाने में.”

शायर नुरैन फैजाबादी बताते हैं कि बशीर बद्र शहर के सुजातगंज में होने वाले मुशायरों का संचालन करने भी आते रहे हैं। उस समय उनके शेर ओ शायरी पर हर तरफ वाह-वाह की सदाएं गूंजती रहती थीं। शायर जावेद गोंडवी बताते हैं कि बशीर साहब ने शेर-ओ-शायरी कहने के साथ पुलिस में भी नौकरी की थी। उन्होंने सादगीपूर्ण जीवन बिताया। जावेद बताते हैं कि कई बार उनके साथ मुशायरे में शिरकत करने का गौरव मिला है। उर्दू के जानेमाने शायर वसीम बरेलवी बशीर बद्र की मौत को शायरी की दुनिया की एक बड़ा नुकसान मानते हैं। वह कहते हैं कि “हमारा बहुत लंबा साथ रहा। बहुत कम लोगों का इतना गहरा साथ होता है. हम मुशायरों की दुनिया में साथ रहे। उनका जाना उर्दू शायरी के लिए और मेरे लिए बहुत बड़ी क्षति है।” वसीम बरेलवी कहते हैं कि बशीर बद्र की शायरी, सुनने वाले और पढ़ने वाले दोनों पर असर छोड़ती थी, “अगर वो स्वस्थ रहते तो दुनिया को उनसे और बहुत कुछ मिलता” वहीं उनके बेटे तैय्यब बद्र कहते हैं कि उन्होंने 1969 में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की थी। बाद में उन्होंने “आजादी के बाद उर्दू ग़ज़ल का तनक़ीदी मुताला” विषय पर पीएचडी भी की, जिसे आज भी कई जगह पढ़ाया जाता है।तैय्यब बद्र याद करते हुए कहते हैं, “अब्बा जब अलीगढ़ में पढ़ने गए थे तो उन्हें वहां जाकर पता चला कि कॉलेज के सिलेबस में उनकी लिखी हुई शायरियां, ग़ज़लें पढ़ाई जा रहीं थीं। अब्बा को बहुत फ़क्र था इस बात पर।”

उनकी ग़ज़लों में मोहब्बत, तन्हाई, रिश्तों, बिछड़ने का गम और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के अनुभव दिखाई देते थे। उनके कई शेर आज भी मुशायरों, सोशल मीडिया पोस्ट, राजनीतिक भाषणों और आम बातचीत में अक्सर सुनाई देते हैं।उनके निधन के बाद सोशल मीडिया पर लोग लगातार उनके शेर साझा कर रहे हैं। उनमें से एक शेर बार बार याद किया जा रहा है, जो उनके घर के बाहर भी तख़्ती में लिखा हुआ है-
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए

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