जलियांवाला बाग नरसंहार की 107वीं बरसी: देश ने दी शहीदों को भावभीनी श्रद्धांजलि, इतिहास के उस ‘खूनी बैसाखी’ को किया याद

नेशनलजलियांवाला बाग नरसंहार की 107वीं बरसी: देश ने दी शहीदों को भावभीनी...

Date:

अमृतसर/नई दिल्ली: आज पूरा देश जलियांवाला बाग नरसंहार की 107वीं बरसी मना रहा है। 13 अप्रैल 1919 को बैसाखी के पावन पर्व पर जनरल डायर के आदेश पर निहत्थे भारतीयों पर जो गोलियां बरसाई गई थीं, उनके जख्म आज भी देश के मानस पटल पर ताजा हैं। अमृतसर स्थित शहीद स्मारक पर सुबह से ही प्रार्थना सभाओं और श्रद्धांजलि कार्यक्रमों का सिलसिला जारी है।

शहीदों को नमन: राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने दी श्रद्धांजलि

PTI की एक रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री ने सोशल मीडिया और आधिकारिक बयानों के माध्यम से जलियांवाला बाग के शहीदों को नमन किया। प्रधानमंत्री ने अपने संदेश में कहा कि हमारे वीर शहीदों का बलिदान हर भारतीय को राष्ट्र की सेवा के लिए प्रेरित करता रहेगा। अमृतसर के जलियांवाला बाग स्मारक पर पंजाब के मुख्यमंत्री और अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने ‘अमर ज्योति’ पर पुष्पचक्र अर्पित किए।

क्या हुआ था 13 अप्रैल 1919 को?

जलियांवाला बाग की घटना ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की क्रूरता का सबसे काला अध्याय है। BBC की एक ऐतिहासिक रिपोर्ट के मुताबिक, रोलेट एक्ट के विरोध में और नेता डॉ. सत्यपाल और सैफुद्दीन किचलू की गिरफ्तारी के खिलाफ करीब 15,000 से 20,000 लोग शांतिपूर्ण सभा के लिए बाग में जमा हुए थे।

तभी ब्रिगेडियर जनरल रेजिनल्ड डायर ने बिना किसी चेतावनी के बाग के एकमात्र निकास द्वार को घेर लिया और सैनिकों को अंधाधुंध फायरिंग का हुक्म दे दिया। मात्र 10 मिनट में लगभग 1,650 राउंड गोलियां चलीं। सरकारी आंकड़ों में मरने वालों की संख्या 379 बताई गई थी, लेकिन अनाधिकारिक आंकड़ों और कांग्रेस की जांच समिति के अनुसार, इस नरसंहार में 1,000 से अधिक लोग शहीद हुए थे।

स्मारक की दीवारों पर आज भी मौजूद हैं गोलियों के निशान

आज भी जलियांवाला बाग की दीवारों पर गोलियों के निशान उस भयावह मंजर की गवाही देते हैं। नेशनल आर्काइव्स (National Archives) के दस्तावेजों के अनुसार, बाग के भीतर स्थित वह कुआँ (शहीदी कुआँ) आज भी मौजूद है, जिसमें लोग गोलियों से बचने के लिए कूद गए थे और अपनी जान गंवा दी थी। हाल के वर्षों में केंद्र सरकार द्वारा किए गए स्मारक के जीर्णोद्धार (Renovation) के बाद अब यहाँ एक ‘साउंड एंड लाइट’ शो के माध्यम से उस इतिहास को नई पीढ़ी तक पहुँचाया जा रहा है।

वैश्विक प्रतिक्रिया और माफी की मांग

ब्रिटिश सरकार ने समय-समय पर इस घटना को “ब्रिटिश भारतीय इतिहास की एक शर्मनाक घटना” बताया है, लेकिन भारत में आज भी आधिकारिक रूप से ‘पूर्ण माफी’ (Full Apology) की मांग उठती रहती है। विशेषज्ञों का मानना है कि जलियांवाला बाग नरसंहार ने ही भगत सिंह और उधम सिंह जैसे क्रांतिकारियों के मन में आजादी की मशाल जलाई थी।

निष्कर्ष

आज की 107वीं बरसी पर देश न केवल उन शहीदों को याद कर रहा है, बल्कि अपनी आजादी के मूल्यों को संरक्षित करने का संकल्प भी ले रहा है। अमृतसर का यह बाग अब केवल एक बगीचा नहीं, बल्कि भारतीय शौर्य और बलिदान का एक तीर्थ बन चुका है।

Share post:

Subscribe

Popular

More like this
Related