यूपी, बिहार, बंगाल: चुनाव शेड्यूल पर उठते सवाल

आर्टिकल/इंटरव्यूयूपी, बिहार, बंगाल: चुनाव शेड्यूल पर उठते सवाल

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अमित बिश्नोई
चुनाव आयोग ने लोकसभा चुनाव 2024 के पूरे कार्यक्रम का एलान कर दिया है, अधिसूचना से लेकर मतों की गिनती तक. बदलाव कोई भी नहीं हुआ है, पहले की तरह इसबार भी सात चरणों का लम्बा चुनाव है. अगर 16 मार्च से 4 जून तक जोड़ें, जिस दिन वोटों की गिनती होनी है तो 81 दिन तक चुनाव की प्रक्रिया चलेगी, इसमें सरकार बनने की प्रक्रिया शामिल नहीं है, उसमें भी कई दिन लग सकते हैं. तो कुल मिलाकर पिछली बार की तरह एक और उबाऊ चुनाव। सवाल ये उठता है कि टेक्नोलॉजी के इस दौर में इतने लम्बे चुनाव कि पहले चरण में वोट डालने वाला वोटर भूल ही जाय कि चुनाव हो गया कि नहीं, नतीजा आया की नहीं। क्योंकि उसके हिसाब से तो चुनाव का फैसला 45-46 दिन बाद आएगा। लगभग दो महीने। इससे तो कहीं जल्दी चुनाव बैलेट पेपर से होते थे तब तीन महीने तो कतई नहीं लगते थे, सवाल तब भी उठते थे. तब में और अब में फर्क सिर्फ इतना है कि पहले मतों की गिनती कई दिन चलती थी और अब शाम तक रिजल्ट आ जाता है लेकिन इसके बदले मतदान की प्रक्रिया इतनी लम्बी कर दी गयी है जिसपर एक दो नहीं हज़ारो सवाल उठ सकते हैं और उठते भी हैं, जिनमें तर्क भी होता है।

अब आप ही बताइये कि उत्तर प्रदेश की 80 सीटों पर सात चरणों में चुनाव का तर्क क्या है। पहले देश के एक सिरे से चुनाव शुरू होते थे और दुसरे सिरे पर ख़त्म होते थे, कुछ राज्य ऐसे होते थे जहाँ भौगोलिक परिस्थितियों के कारण कई चरण में चुनाव कराये जाते थे या फिर नक्सल प्रभावित राज्यों में कई चरण में मतदान होते थे लेकिन वहां भी ऐसा नहीं होता था कि सभी के सभी चरणों में मतदान कराये जांय। अब आप ही बताइये कि उत्तर प्रदेश या फिर बिहार या पश्चिम बंगाल में सात चरणों में चुनाव क्यों ? माना कि पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा एक आम बात है लेकिन 42 सीटों के चुनाव के लिए सात चरण में चुनाव?

पश्चिम बंगाल छोड़िये, चलिए उत्तर प्रदेश की बात करते हैं। यहाँ पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जीरो टॉलरेंस की बात करते हैं. क्राइम फ्री स्टेट की बात करते हैं , वैसे भी छिटपुट घटनाओं को छोड़कर यूपी में चुनावी हिंसा की खबरे नहीं आतीं या फिर बिहार में चुनाव को सात भागों में क्यों बांटा गया? वहां तो सुशासन बाबू का शासन है वो भी भाजपा के साथ. बिहार में कभी बूथ लुटे जाते थे लेकिन वो तो बाबा आदम के ज़माने की बात है, आज तो बिहार में भी कहीं से बूथ कैप्चरिंग की बात सुनने को नहीं मिलती। तो फिर पूरे बिहार को तीन महीने बिज़ी रखने की ज़रुरत निर्वाचन आयोग को क्यों पड़ गयी.

अब यहीं पर अगर विपक्षी राजनीतिक दल सवाल उठाते हैं तो कहा जाता है कि उन्हें चुनाव आयोग में विश्वास नहीं है, देश की संवैधानिक संस्था में भरोसा नहीं है लेकिन जो सामने नज़र आता है उससे कोई आँखें तो मूँद नहीं सकता। मायावती ने सवाल उठाया, भले ही उसे दुसरे ढंग से उठाया लेकिन समय बड़ा लम्बा है और इतने दिनों की खर्चीली चुनावी प्रक्रिया में टिके रहना हर राजनीतिक दल के बस की बात नहीं है. ये पूरे देश को मालूम है कि आज के वक्त में पैसा किस पार्टी के पास है. कांग्रेस पार्टी लगातार रोना रो रही है कि सारा चुनावी चंदा एक ही पार्टी के पास जा रहा है और उसके पास जो आ रहा है उसपर भी मोदी सरकार रोक लगाए हुए, खातों को सीज़ किये हुए है.

बात निकलती है तो दूर तलक जाती है। यूपी, बिहार और बंगाल के चुनावी शेड्यूल पर निर्वाचन आयोग, भाजपा से प्रभावित राजनीतिक विश्लेषक समर्थन में भले ही कोई भी तर्क दें लेकिन उत्तर प्रदेश का नाम आने पर वो भी निरुत्तर हो जाते हैं, उन्हें भी हैरानी है कि यूपी में निर्वाचन आयोग सात चरणों में चुनाव क्यों करवा रहा है. हालाँकि इसमें चौंकने जैसी कोई बात नहीं है। पूरे चुनावी कार्यक्रम को इस तरह डिज़ाइन किया गया लगता है जिसमें देश के एकमात्र स्टार इलेक्शन कैम्पेनर मोदी जी की पहुँच हर लोकसभा तक बनाई जाए. अब चूँकि यूपी और बिहार तो उनके लिए सीटों का खज़ाना है और बंगाल एक गहरा ज़ख्म जो पिछले विधानसभा चुनाव में उन्हें ममता बनर्जी से मिला था. हर जतन कर डाले थे दीदी को उखाड़ फेंकने के लिए लेकिन नतीजा बहुत खराब मिला था. मोदी जी ने बंगाल जीतने के लिए अपना गेटअप तक बदल दिया था, लोग उनमें टैगोर को देख रहे थे. यही वजह है कि इन तीनों राज्यों को मतदान प्रक्रिया के दौरान वो मथ देना चाहेंगे और शायद निर्वाचन आयोग का कार्यक्रम भी उन्हें पूरी तरह सूट करेगा। प्रोग्राम के सूटनेस की बात करें तो बता दें कि मोदी जी की अपनी लोकसभा सीट वाराणसी में मतदान 1 जून को है, यानि अंतिम चरण में, मतलब पूरे देश में चुनाव प्रचार के बाद अंत में अपनी सीट पर पूरा ध्यान।

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