अमित बिश्नोई
सरकार ने कुश्ती संघ के खिलाफ एक्शन ले लिया तो बृजभूषण शरण सिंह को अपने पोस्टर में दबदबे की बू आने लगी और उन्होंने अपने घर के बाहर लगे दबदबा था और रहेगा वाला पोस्टर हटाना पड़ा। सरकार एक्शन में आयी तो दबदबा महाराज ने भी साक्षी की तरह कुश्ती से संन्यास ले लिया। भाजपा के दबंग सांसद का कहना कि साक्षी ने सन्यास ले लिया और मैंने भी संन्यास ले लिया, बात ख़त्म लेकिन क्या वाकई इतना कह देने से बात खत्म हो जाएगी। शायद नहीं , सांसद महोदय बात तो अभी नहीं ख़त्म होगी, विपक्ष इसे ख़त्म नहीं होने देगा।
आज खेल मंत्रालय ने कुश्ती संघ को अगले आदेश तक निलंबित कर दिया। सरकार के इस अचानक एक्शन पर शायद बहुत से लोगों हैरानी हुई होगी लेकिन इसमें हैरानी जैसी कोई बात नहीं। सरकार को तो एक्शन में आना ही था. ये अलग बात है कि साक्षी मलिक और बजरंग पुनिया ने बहुत बड़ा कदम उठा लिया था लेकिन कदम तो देश भर के पहलवान 11 महीने पहले भी उठाये थे. पूरे विश्व में देश का मान बढ़ाने वाली महिला पहलवानों ने जंतर मंतर पर दर्जनों रातें गुज़ारी थी, सड़कों पर घसीटी गयी थी, जंतर मंतर पर उनके आंदोलन को उखाड़ फेंकने के लिए सरकार से जो बन पड़ सकता था वो किया और अंततः उन्हें जंतर से खदेड़ कर ही दम लिया. खिलाडियों के बीच फूट डलवाने की हर कोशिश की, उनका कैरियर बर्बाद करने की धमकी दी, उनकी नौकरियों को खतरे में डाला। तब सरकार को इन पहलवानों की कोई फ़िक्र नहीं थी, बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ कोई एक्शन नहीं, महिला पहलवानों ने सबूत दिखाए, गवाहों ने उनकी पुष्टि की मगर बृजभूषण बेदाग़ रहे, उन्हें WFI से कथित दौर पर दूर रखा गया मगर वो दूर नहीं थे, इस बात को बृजभूषण ने कई बार कहा कि कुश्ती संघ में कोई और नहीं आ सकता और हुआ भी ऐसा ही, नए चुनाव हुए मगर सिर्फ नाम बदला, चेहरा बदला लेकिन दबदबा नहीं बदला।
दबदबा था और दबदबा रहेगा। क्या धाँसू फ़िल्मी डायलॉग है लेकिन हाय अफ़सोस! अगर ये बैरी चुनाव सिर पर न होते तो ये दबदबा ऐसे ही चलता रहता और संजय सिंह की शक्ल में बृजभूषण की बादशाहत बरकरार रहती। मगर केंद्र में जो सरकार है उसके बारे में मशहूर है कि सत्ता पर अगर कोई आंच आएगी तो फिर कोई चाहे जितना भी करीबी हो, उसे रास्ते से हटना ही होगा। बृजभूषण शरण सिंह भी हट गए. कहने लगे अब मेरा कुश्ती से कोई वास्ता नहीं। सिर्फ दो दिन में ही वास्ता ख़त्म हो गया, संजय सिंह के अध्यक्ष बनने पर जो फोटो सामने आयी उनसे तो साफ़ तौर पर यही लग रहा था कि असली विक्ट्री साइन तो बृजभूषण शरण सिंह का ही था, फूल मालाओं से तो वहीँ लदे हुए थे.
सरकार के मजबूरी वाले एक्शन के बाद बृजभूषण भी लोकसभा चुनाव की तैयारी की बात कर रहे हैं. कह रहे हैं कि उनके पास कुश्ती के अलावा और बहुत से काम हैं , उनके पास समय नहीं है, महिला पहलवानों के साथ यौन शोषण के आरोपों को वो अब भी हवा में उड़ा रहे हैं , फिलहाल वो अपने गृह जनपद कैसरगंज से चुनाव लड़ने की बात कर रहे हैं, उन्होंने भाजपा अध्यक्ष से मुलाक़ात भी की जो बड़ी चर्चा में रही, सरकार के अचानक लिए गए इस एक्शन के बाद बृजभूषण और नड्डा की मुलाकात की चर्चा तो होनी ही थी. शायद नड्डा जी ने ऊपर से आया हुआ सन्देश बृजभूषण को दिया होगा कि बृजभूषण से कहिये बहुत बोल लिए अब मुंह बंद कीजिये। शायद यही वजह रही होगी कि बृजभूषण को प्रेस वार्ता बुलाकर अपनी दबदबे वाली बात पर सफाई देनी पड़ी, पछतावा दिखाना पड़ा, उसे गलत बताना पड़ा. वर्ना एक साल से चल रहे इस मामले पर उन्होंने इस तरह का कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया।
बृजभूषण ने भी समझ लिया कि पहलवानों से पन्गा तो ठीक लेकिन भाजपा आलाकमान से पन्गा मंहगा पड़ जायेगा। यह मुद्दा जितनी जल्दी ठंडा हो जाय ये भाजपा और बृजभूषण दोनों के लिए सही रहेगा। कांग्रेस पार्टी तैयार बैठी है इस मुद्दे को लपकने के लिए. साक्षी मालिक और बजरंग पुनिया के एक्शन के बाद वो बड़ी तेज़ी से एक्टिव हुई है, प्रियंका गाँधी ने साक्षी के घर जाने में देरी नहीं लगाईं। कांग्रेस का स्पोर्ट्स सेल सक्रीय हो गया, प्रेस कांफ्रेंस का दौर शुरू हो गया. ऐसे में भाजपा को लगा कि अगर अब एक्शन नहीं लिया तो नुक्सान भी उठाना पड़ सकता है और उसने WFI की पूरी बॉडी को निलंबित कर अप्रत्यक्ष रूप से ही सही बृजभूषण सिंह की दबदबे वाली का बात जवाब का दिया। भाजपा इसे कोई भी नाम दे लेकिन हर कोई जनता है कि ये विशुद्ध राजनीतिक एक्शन है जो लोकसभा चुनाव को लेकर लिया गया है. इसमें महिला पहलवानों को इन्साफ दिलाने वाली कोई बात नहीं है.

