आखिर क्यों इस समाज में शादी के बाद बदल जाता है लड़की का पूरा नाम

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शादी करके दो लोग एक साथ नई जिंदगी की शुरुआत करते हैं। यहां सब कुछ खुशहाल हो इसके लिए दोनों लोगों को अपना अतीत छोड़कर साथ आना होता है । सरल भाषा में कहें तो शादी के बाद सब कुछ बदल जाता है, या बदलना पड़ता है। लेकिन आमतौर पर देखा जाता है कि लड़कियों के लिए ये बदलाव अलग स्तर के होते हैं। उन्हें अपना घर छोड़कर पति के साथ उसके घर में बसना पड़ता है। उसका परिवार अचानक उसके माता-पिता से भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। इतना ही नहीं उन्हें अपना सरनेम और नाम तक बदलना पड़ा है.

वैसे तो शादी के बाद लड़कियों का सरनेम बदलने की परंपरा देश-विदेश में चल रही है। लेकिन पूरा नाम बदलने वाले इस रिवाज से आज भी बहुत सारे लोग अनजान है। लेकिन इस रिवाज को मानने वाला एक समाज ऐसा है, जहां पर बिना दुल्हन का नाम बदले शादी पूरी नहीं मानी जाती है।

भारत में कई समाज के लोग रहते हैं। इसलिए यहां की परंपराओं और रीति-रिवाजों में काफी विविधता है, जो इस देश की खूबसूरती भी है। इसकी सबसे अच्छी झलक शादियों के दौरान देखने को मिलती है। भले ही यहां की सभी शादियां दूर से एक जैसी दिखती हों, लेकिन कुछ अपने अलग रीति-रिवाजों और इसके पीछे के तर्क के कारण ये अपने आप में खास हो जाती हैं। अब सिंधी समाज को ही लीजिए, इसमें शादी के बाद लड़की को न सिर्फ अपना सरनेम बल्कि पूरा नाम भी बदलना पड़ता है।

दुल्हन का नाम बदलने का कारण

सिंधी समाज में शादी तभी पूरी मानी जाती है जब लड़की का नया नाम पति के नाम के साथ जुड़ जाए। ऐसा करने के पीछे मान्यता यह है कि शादी एक लड़की के लिए नए जन्म की तरह होती है। जिसके बाद उसका पुराना घर परिवार पराया हो जाता है, सबसे पहले उसके साथ उसके पति का रिश्ता अहम होता है। ऐसे में माना ये जाता है कि दुल्हन एक नए नाम के साथ अपनी नई जिंदगी में प्रवेश करती है।

दुल्हन का नाम कैसे रखा जाता है?

दुल्हन का नाम दूल्हे के नाम और कुंडली के आधार पर रखा जाता है। पंडित जी दूल्हे के नाम का एक पत्र निकालते हैं, जिसके बाद दुल्हन का नया नाम रखा जाता है। दुल्हन स्वयं भी दिए गए पत्र से अपना नाम बता सकती है।

क्या शादी के लिए नाम और उपनाम बदलना जरूरी है?

समय के साथ हर समाज के रीति-रिवाजों में बदलाव आया है। धीरे-धीरे जैसे-जैसे लड़कियों ने अपना सरनेम हटाना बंद कर दिया, वैसे-वैसे अब सिंधी समाज में नाम बदलने की परंपरा भी कम होती जा रही है। इसके पीछे एक वजह ये भी हो सकती है क्योंकि अब आधिकारिक तौर पर नाम बदलना बहुत मुश्किल है. और अलग-अलग नाम होने के कारण कई बार सरकारी डॉक्यूमेंटेशन में काफी दिक्कतें आती हैं, जिसमें पैसा और समय दोनों बर्बाद होता है।

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