खामोश मायावती ने बढ़ाई राजनीतिक दलों की टेंशन

उत्तर प्रदेशखामोश मायावती ने बढ़ाई राजनीतिक दलों की टेंशन

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खामोश मायावती ने बढ़ाई राजनीतिक दलों की टेंशन

  • विधानसभा चुनाव की बेला में मायावती की चुप्पी कर रही बेचैन

सुनील शर्मा

शायद ही इससे पहले आपने किसी सत्तारूढ राजनीतिक दल के वरिष्ठ नेता को विपक्षी दल की मुखिया को चुनावी मैदान में प्रचार के लिये उतरने के लिये कहते देखा होगा। लेकिन ऐसा हुआ जब केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने मुरादाबाद में सभा को संबोधित करते हुए अब तक चुप्पी साधे बैठी बसपा प्रमुख मायावती को लेकर कहा था कि चुनाव आ गये हैं बहनजी थोड़ा बाहर निकलिये। लोगों को यह अमित शाह का तंज ही लगा होगा लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि शायद अमित शाह भी यह जानना चाहते होंगे चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री रहीं मायावती कर अरहीं हैं? आखिर मायावती की इस चुप्पी की वजह क्या है? कहीं यह बसपा की खास रणनीति तो नहीं जिसका अंदाजा लगा पाने में वह नाकामयाब हो रहे हों और जो बाद में उनपर भारी पड़ जाये।

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक दलों की सक्रियता बढ़ गयी है। कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी, सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और पीएम मोदी, गृहमंत्री अमित शाह से लेकर भाजपा के अनेक वरिष्ठ नेता खुद चुनावी मैदान में उतर चुके हैं। उत्तर प्रदेश में चहुंओर राजनीतिक रैलियां और सभाएं आयोजित की जा रही हैं। मगर इनके बीच यदि बसपा कहीं दिख रही है तो सिर्फ ट्वीटर पर ही। बसपा प्रमुख मायावती फिलहाल ट्वीटर पर ही सक्रिय दिख रहीं हैं। वरना बात करें पिछले 90 दिनों की तो मायावती चुनावी धरातल से दूरी बनाये हुए हैं। हालांकि मायावती प्रेस कांफ्रेंस, बैठक आदि जरूर कर रही हैं मगर अब तक उन्होंने बसपा की राजनीतिक रैली या सभा को संबोधित नहीं किया है।

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बसपा प्रमुख मायावती की चुप्पी के अलग-अलग मायने निकाले जा रहे हैं। किसी का कहना है कि हाल ही वरिष्ठ नेताओं ने बसपा से किनारा कर अन्य राजनीतिक दलों का दामन थाम लिया है। ऐसे में मायावती कमजोर हो चुकी बसपा को संभालने का प्रयास कर रही हैं। वहीं कुछ लोगों का यह भी कहना है कि सीबीआई और ईडी जैसी जांच एजेंसियों से मायावती घबराई हुई हैं। क्योंकि उन पर और उनके परिवार के सदस्यों पर आय से अधिक संपत्ति के मामले चल रहे हैं।

चुनावी विश्लेष्कों के आंकलन कुछ भी कहें लेकिन जब चुनावी रणभूमि में योद्धा उतर चुके हों, एक-दूसरे पर शब्दों के बाण चलाये जा रहे हों ऐसे में मायावती की चुप्पी कहीं पूर्व मुख्यमंत्री का साईलेंट गेम प्लान तो नहीं? और यही बात विपक्षी दलों खासकर भाजपा को परेशान किये हुए है। चार बार प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी मायावती को चुका हुआ मान लेने की गलती करना किसी भी राजनीतिक दल के लिये नुकसानदेह साबित हो सकता है। और यह गलती कम से कम भाजपा तो नहीं करना चाहेगी। क्योंकि 2017 में बसपा से नाराज हुए दलित वोटर उसके पाले में ही आये और भाजपा को प्रदेश के सत्ता सिंहासन में बैठने का मौका हासिल हुआ।

दलित वोटबैंक के सहारे उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज होने वाली बसपा से दलित वोटर दूर भले ही हुए हों लेकिन भाजपा से नाराज होने के बाद उनके लिये बसपा ही एकमात्र पार्टी बचती है। भीम आर्मी पार्टी के चन्द्रशेखर अभी दलित वोटरों में इतनी पैंठ नहीं बना पाये हैं कि बसपा का वोटर उनके साथ हो जाये। वहीं भाजपा के साथ सपा और कांग्रेस की निगाहें भी दलित वोटबैंक पर गढ़ी हैं। सभी को चिंता इसी बात की है कि यदि मायावती कमबैक कर गयीं तो वह सत्ता भले ही न हासिल कर पायें मगर सत्ता हासिल करने का खेल जरूर बिगाड़ सकती हैं।

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अब मायावती की चुप्पी के पीछे हमें बसपा की रणनीति को भी समझना आवश्यक है। जिस प्रकार भाजपा के लिये आरएसएस साईलेंट कैंपेनिंग करती है उसी प्रकार बसपा का चुनावी प्रचार भी लोगों के बीच गुप्त रूप से चलता रहता है। बसपा जब पहली बार उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज हुई थी तो किसी को भी बसपा की प्रचंड जीत का अंदाजा तक नहीं था। उस वक्त भी साईलेंट कैंपेनिंग ही बसपा की जीत का आधार थी। ऐसे में अब तक चुनावी मैदान में न उतरने वाली बसपा प्रमुख की चुप्पी से राजनीतिक दलों का बेचैन होना स्वाभाविक है।

कहा जाता है कि जब तक सामने वाला मैदान में न उतरे तब तक उसकी ताकत का अंदाजा लगाना मुश्किल है। चुनावी विश्लेष्णों से इतर सभी को इंतजार है बसपा प्रमुख मायावती के चुनावी शंखनाद करने का। इस बार के चुनाव में मायावती फिर सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला अपनायेंगी या भरोसेमंद दलित वोटरों पर ही ध्यान केंद्रित करेंगी यह सवाल सभी के मन में हैं। संभवत मायावती सभी की चालों को गौर से भांप रही हों और एक दिन उनका हाथी विपक्षी खेमे को तहस-नहस कर दे। यह संभावना नहीं बल्कि राजनीतिक दलों की आशंका है जो उन्हें खाये जा रही है।

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