नई दिल्ली। केरल हाईकोर्ट ने बच्चों के खतने की प्रथा को बच्चों के अधिकारों के उल्लंघन, अवैध, संज्ञेय और गैर.जमानती अपराध के रूप में घोषित करने की मांग करने वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया है। जनहित याचिका गैर.धार्मिक नागरिकों और पांच अन्य व्यक्तियों द्वारा दायर की गई है।
जनहित याचिका को चीफ जस्टिस एस मणिकुमार और न्यायमूर्ति मुरली पुरुषोत्तम की खंडपीठ ने खारिज की। कोर्ट ने कहा, अदालत कानून बनाने वाली संस्था नहीं है। नॉन रिलिजियस नामक एक संगठन की ओर से दायर याचिका में लड़कों के खतना प्रथा पर रोक लगाने के लिए कानून बनाने पर विचार करने के लिए केंद्र सरकार को निर्देश देने का भी अनुरोध किया गया था।
खतना प्रथा बच्चों के मानवाधिकारों का उल्लंघन
याचिका में कहा गया था कि खतना की प्रथा बच्चों के मानवाधिकारों का उल्लंघन है। खतने से आघात सहित कई स्वास्थ्य समस्याएं होने का खतरा होता है। साथ ही अन्य जोखिम भी होते हैं। याचिका में कहा गया है कि बाल अधिकारों पर संयुक्त राष्ट्र संधि, 1989 और संयुक्त राष्ट्र की महासभा द्वारा अपनाया गया नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय अनुबंध, जिसका भारत एक सदस्य और हस्ताक्षरकर्ता है।
इसके प्रावधानों के आधार पर इस बात पर जोर देता है कि सभी बच्चों को एक प्यार भरे वातावरण, किसी भी प्रकार के नुकसान, हमलों, दुर्व्यवहार और भेदभाव से मुक्त सुरक्षित स्थान पर रहने का अधिकार है। यह केवल उनके माता.पिता द्वारा लिए गए एकतरफा निर्णय के कारण पालन करने के लिए मजबूर किया जाता है। जिसमें बच्चे के पास कोई विकल्प नहीं होते हैं। याचिका में कहा गया है कि यह अंतरराष्ट्रीय संधियों के प्रावधानों का स्पष्ट उल्लंघन है।
खतना के कारण शिशुओं की मौत की घटनाएं
कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया था कि खतना की प्रथा के कारण शिशुओं की मौत की कई घटनाएं हुई हैं। इस प्रथा का अभ्यास क्रूरए अमानवीय और बर्बर है और यह भारत के संविधान के अनुच्छे 21 के तहत बच्चों के मूल्यवान मौलिक अधिकारए जीवन के अधिकार उल्लंघन करता है।

