उत्तर प्रदेश की ट्रैफिक पुलिस आये दिन ट्रैफिक नियमों और उनको पालन करने किये अभियान चलाती है. अभियान के दौरान कभी सख्ती बरतती है तो कभी नरमी, कभी डांट डपट तो कभी गुलाब के फूल देकर जागरूकता फैलाने के प्रयास करती है. मेरठ ट्रैफिक पुलिस भी यही सब करती है, अभियान चलाती है चालान काटती है , वसूली करती है और फिर अखबारों में खबर भी छपती है, “नो पार्किंग ज़ोन में खड़े 197 वाहनों का चालान”, “नो पार्किंग में खड़े 92 वाहनों का चालान कर वसूले 5400 सौ रूपये”. कभी यातायात जागरूकता रैली तो कभी ट्रैफिक रूल्स पर सेमिनार, लेकिन यह सारे नियम कानून लगता है सिर्फ आम जनता के लिए हैं उनको पालन कराने वालों के लिए नहीं।
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मेरठ शहर में एक चौराहा है, जो सिविल लाइन थाना क्षेत्र में आता है, नाम है आदर्श चौराहा। चारों तरफ कैमरे लगे हैं, ट्रैफिक नियमों के होर्डिंग लगे हैं, मजाल है कोई नियमों को तोड़ दे. तोडा तो हुआ चालान, वहां से बच के निकल गए तो घर पहुँच जाएगा चालान। लोग इस चौराहे पर विशेष तौर पर सावधान रहते हैं कि कहीं कोई ट्रैफिक रूल न टूट जाय. हर आम आदमी ठीक ज़ेबरा लाइन के पीछे, निगाहें ट्रैफिक लाइट पर. लेकिन खाकी वर्दी धारियों पर यह नियम नहीं लागू होते, लाइन में आगे खड़ा होना अपनी शान समझते हैं, फिर वह चाहे ज़ेबरा लाइन ही क्यों न हो. यकीन न हो तो यह तस्वीर देखिये।
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रेड सिग्नल है, ज़ेबरा लाइन खाली है, बाक़ी सब पीछे हैं जो तस्वीर के फ्रेम में नहीं हैं मगर यह दो महाशय जिसमें एक तो स्टार वाले लग रहे हैं और दूसरे बिना स्टार वाले और दोनों ही शान से ज़ेबरा लाइन के आगे खड़े हैं. बिना स्टार वाले तो स्टार वाले से भी आगे हैं. इन्हें न कैमरों का डर है और न नियमों की परवाह। इनका एटीट्यूड आदर्श चौराहे का अनादर करता हुआ नज़र आ रहा है. क्या आला अधिकारी इन्हें ट्रैफिक नियमों के बारे में कुछ सिखाएंगे। क्या इन्हे यह बताया जायेगा कि नियम लागू करवाने पर नियमों के पालन करने की ज़िम्मेदारी और भी ज़िम्मेदारी होती है.

