चुनाव में हार का डर या भाजपा ने खेला चुनावी मास्टर स्ट्रोक!

उत्तराखंडचुनाव में हार का डर या भाजपा ने खेला चुनावी मास्टर स्ट्रोक!

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चुनाव में हार का डर या भाजपा ने खेला चुनावी मास्टर स्ट्रोक!

  • प्रकाश पर्व पर कृषि कानून को वापस लेकर सिख समुदाय को साधा
  • पंजाब विधानसभा चुनाव में 77 सीटों पर मिल सकता है फायदा
  • पांच राज्यों में अगले साल होने हैं विधानसभा चुनाव

सुनील शर्मा

14 माह से चले आ रहे किसान आंदोलन को कामयाबी मिली और मोदी सरकार ने विवादित तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का ऐलान कर दिया। विपक्षी दल जहां इसे अगले वर्ष पांच राज्यों में होने वाले चुनाव में हार के डर के चलते मोदी सरकार का किसानों के आगे झुकना मान रहे हैं। वहीं विधानसभा चुनाव की बेला में खास प्रकाश पर्व के दिन तीनों कृषि कानून वापस लेने को पीएम मोदी को चुनावी मास्टर स्ट्रोक भी माना जा रहा है।

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गौरतलब है कि किसान आंदोलन का सर्वाधिक प्रभाव पंजाब और उत्तर प्रदेश में देखने को मिला है। अगले साल उत्तर प्रदेश, पंजाब, उत्तराखंड, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। ऐसे में किसानों का विरोध भाजपा को नुकसान पहुंचा सकता था। हाल ही में हुए उपचुनावों में भी भाजपा को करारी हार का सामना करना पड़ा था। पंजाब में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी तो उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस के अलावा रालोद किसानों को समर्थन देकर भाजपा की मुश्किलें बढ़ा रही थी। यूपी में अन्य राजनीतिक दल जैसे बसपा, प्रगतिशील समाज पार्टी, आम आदमी पार्टी आदि भी किसानों की मांगों को लेकर हमलावर थीं। वहीं उत्तराखंड में हुए उपचुनाव में भाजपा की हार ने पार्टी नेतृत्व को जिद छोड़ने पर मजबूर किया। पंजाब में भाजपा की स्थिति इस कदर खराब हो चुकी थी कि पार्टी नेताओं के लिये अपने क्षेत्रों में निकलना तक भारी हो गया था। चहुंओर भाजपा का विरोध हो रहा था जिसके चलते चुनाव प्रचार करना तो दूर बैठक तक नहीं कर पा रहे थे।

कानून वापसी के लिये प्रकाश पर्व का दिन ही क्यों चुना

कृषि कानून वापस लेने के लिये पीएम मोदी ने प्रकाश पर्व का दिन ही क्यों चुना जबकि वह कुछ समय पहले आयी दीपावली पर भी किसानों को तोहफा दे सकते थे। राजनीतिक गलियारों में पीएम मोदी के इस खास दिन को चुने जाने को उनका मास्टर स्ट्रोक माना जा रहा है। दरअसल किसान आंदोलन में सिख किसानों की महत्वपूर्ण भूमिका रही और किसान संगठनों में भी सिख नेताओं का ही दबदबा है। सिख समाज के पहले पातशाही गुरु नानक देव जी के प्रकाश पर्व की खुशियां मना रहे सिख समाज को पर्व की खुशियां दोगुनी कर मोदी सरकार ने सिख समाज से भावनात्मक रूप से जुड़ने की कोशिश की है। यह कोशिश अगले वर्ष पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनाव में भाजपा को लाभ पहुंचा सकती है।

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मालवा, माझा और दोआबा एरिया में बंटे हुए पंजाब में सबसे ज्यादा 69 सीटें मालवा में हैं जिन पर किसानों का दबदबा है। पंजाब की सरकार बनाने में मालवा क्षेत्र का बहुत बड़ा योगदान है। वहीं माझा की 25 सीटों पर भी सिख बहुल्य किसान मतदाता हैं जो चुनाव को प्रभावित करने में सक्षम हैं। कृषि प्रधान राज्य पंजाब में 75 फीसद लोग कृषि या उससे जुड़े कार्य करते हैं। जाहिर है मोदी सरकार का यह फैसला उनको लुभाने का प्रयास भी है।
तीनों कृषि कानून वापस लेने का फायदा भाजपा को मिलेगा या विपक्षी दलों यह तो आने वाले विधानसभा चुनावों के बाद ही तय होगा। लेकिन जिस तरह से मोदी सरकार ने 14 महीने तक किसान आंदोलन को समाप्त करने का प्रयास नहीं किया उससे नाराज किसानों को चुनाव से पहले मनाने का प्रयास भी भाजपा को करना होगा। वहीं विपक्षी दल भी कानून वापसी का श्रेय लेने का हरसंभव प्रयास करेंगे। अब देखना यह होगा कि आखिरकार किसान इसका श्रेय किसको देता है। क्या वह भाजपा के पाले में जायेगा या विपक्षी दल किसान मतदाताओं को अपने साथ बनाये रखने में कामयाब होंगे।

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