सिर्फ प्रियंका से काम नहीं चलने वाला

उत्तराखंडसिर्फ प्रियंका से काम नहीं चलने वाला

Date:


सिर्फ प्रियंका से काम नहीं चलने वाला

अमित बिश्‍नोई

उत्तर प्रदेश में अपनी सियासी ज़मीन को दोबारा वापस पाने और जनता तक अपनी पुरानी पहुँच बनाने के लिए प्रियंका गाँधी के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी जी तोड़ मेहनत कर रही है. वह हर उस चुनावी पहलू को छू रही है जो किसी भी राजनीतिक पार्टी को फायदा पहुंचा सकती है. जनता पर हुए सत्ता के किसी भी ज़ुल्म को लेकर प्रियंका गाँधी बहुत मुखर रही रही हैं, सच देखा जाय तो प्रदेश के मुख्य विपक्षी दल समाजवादी पार्टी से भी ज़्यादा जनता के मुद्दों पर आवाज़ बुलंद करने में प्रियंका गाँधी और कांग्रेस पार्टी आगे रही है. लड़की हूँ लड़ सकती हूँ नारे के साथ देश की आधी आबादी को अपना चुनावी लक्ष्य बनाना हो, उनके लिए 40 प्रतिशत राजनीतिक भागीदारी देने की बात हो, उनके लिए अलग मेनिफेस्टो लाना हो या फिर आज बेरोज़गारी की ज्वलंत समस्या पर नौजवानों के लिए अलग घोषणा पत्र ” भर्ती विधान” लाना हो, देखने में कांग्रेस पार्टी के लिए यह सारे कदम ऐसे हैं जो किसी भी चुनाव में एजेंडा सेट करने जैसे हैं, पर अगर गौर करें तो कांग्रेस पार्टी, जो है और जो दिखाने की कोशिश कर रही उसमें ज़मीन आसमान का अंतर है।

Read also: प्रियंका गांधी ने अलवर दुष्कर्म पीड़िता के पिता से बात कर न्याय का आश्वास दिया

चुनावी एजेंडा और लोकलुभावन घोषणाओं की सार्थकता पर हम बाद में बात करेंगे, आज हम कांग्रेस की उत्तर प्रदेश में लीडरशिप पर बात कर लेते हैं. यूपी में आज कांग्रेस की हालत ऐसी है कि न तो उसके पास ज़मीन पर कुछ है और न आसमान में कुछ ख़ास. कहने का मतलब देश की सबसे पुरानी पार्टी 30 बरस से ज़्यादा प्रदेश की सत्ता से दूर है, इतने लम्बे अर्से में उसका काडर ख़त्म हो चूका है, संगठन ध्वस्त हो चूका है, नेताओं का पलायन हो चूका है. जो बचे खुचे हैं उनमें इतना दम नहीं कि पार्टी को फिर से खड़ा कर सकें। साल दर साल प्रदेश का नेतृत्व इस उम्मीद में बदलता रहा कि शायद यह दवा काम कर जाय मगर हर नयी दवा का रिऎक्शन होता गया और कांग्रेस पार्टी कमज़ोर होती चली गयी मजबूरन प्रियंका गाँधी को कांग्रेस पार्टी को एकबार फिर प्रदेश में पार्टी को खड़ा करने के लिए आगे आना पड़ा. इस बात को किसी राष्ट्रीय पार्टी के लिए सम्मान की बात कहा जाय या फिर अपमान का. क्या देश के सबसे बड़े प्रदेश में कांग्रेस पार्टी के पास एक भी ऐसा नेता नहीं है जिसे वह प्रदेश का भावी मुख्यमंत्री बता सके।

प्रियंका गाँधी ने आज भले यह कहकर जताने की कोशिश की कि प्रदेश में हर तरफ पार्टी का चेहरा वहीँ हैं, वह सवाल करती हैं कि क्या आपको मेरे अलावा कोई और चेहरा नज़र आ रहा है. मगर यह सवाल करते हुए उनकी मुस्कान के पीछे छुपी एक पीड़ा भी नज़र आती है, एक मायूसी भी झलकती है. मायूसी की बात इसलिए किसी भी दल से गठबंधन न करने (ऐसा भी कह सकते हैं कि किसी दल ने कांग्रेस में कोई रूचि ही नहीं दिखाई) और सभी 403 सीटों पर चुनाव लड़ने की बात कहने वाली प्रियंका वाड्रा ने आज चुनाव बाद गठबंधन की सम्भावना से इंकार न कर सकीं।

पहले चरण के चुनाव से पहले चुनाव बाद गठबंधन की बात करने को कांग्रेस पार्टी की हताशा और निराशा ही कहा जा सकता है, तो क्या प्रियंका गाँधी को चुनाव से पहले ही चुनाव परिणामों का एहसास हो चूका है जो वह चुनाव बाद सपा की मदद करने की संभावनाओं को ख़ारिज नहीं कर रही हैं. चुनाव बाद किसी दल को समर्थन देने की बात भले ही नई नहीं हो, अनैतिक नहीं हो मगर चुनाव से पहले ही कांग्रेस जैसी पार्टी जिसने प्रदेश के गाँव गाँव में दोबारा पहुँचने का संकल्प लिया हो उसके लीडर के मुंह से ऐसी बातें निकलना, पार्टी का मनोबल गिराती हैं।

Read also: रॉबर्ट वाड्रा पर भाजपा ने लगाए गंभीर आरोप – प्रियंका गांधी से सफाई देने की मांग की

प्रियंका गाँधी ने आज भले ही खुद को प्रदेश के चुनाव में पार्टी का सीएम चेहरा बताया हो मगर उनके इस सांकेतिक एलान से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ने वाला। प्रियंका कोई जादूगरनी नहीं हैं जो छड़ी घुमाएंगी और तीस वर्षों की खोई विरासत वापस मिल जाएगी। सभी जानते हैं कांग्रेस ने प्रियंका को यूपी भेजा है 2024 के लिए, न कि 2022 के लिए. खोई हुई ज़मीन को वापस पाना आसान नहीं होता। दो ढाई साल कुछ नहीं होते, और समय लगेगा। संगठन भी बनाना पड़ेगा और स्थानीय नेताओं के साथ साथ मज़बूत सीएम कैंडिडेट भी ढूंढना होगा जो प्रदेश में पार्टी को गाँधी परिवार के बिना भी आगे ले जा सके, जैसे कि कुछ अन्य राज्यों में हैं, सिर्फ प्रियंका से नहीं चलने वाला।

Share post:

Subscribe

Popular

More like this
Related